इसका रोना – सुभद्रा कुमारी चौहान

तुम कहते हो - मुझको इसका रोना नहीं सुहाता है | मैं कहती हूँ - इस रोने से अनुपम सुख छा जाता है || सच कहती हूँ, इस रोने की छवि को जरा निहारोगे | बड़ी-बड़ी आँसू की बूँदों पर मुक्तावली वारोगे || 1 ||

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आराधना – सुभद्रा कुमारी चौहान

जब मैं आँगन में पहुँची,  पूजा का थाल सजाए। शिवजी की तरह दिखे वे,  बैठे थे ध्यान लगाए॥ जिन चरणों के पूजन को  यह हृदय विकल हो जाता। मैं समझ न पाई, वह भी  है किसका ध्यान लगाता?

अनोखा दान – सुभद्रा कुमारी चौहान

अपने बिखरे भावों का मैं  गूँथ अटपटा सा यह हार। चली चढ़ाने उन चरणों पर,  अपने हिय का संचित प्यार॥ डर था कहीं उपस्थिति मेरी,  उनकी कुछ घड़ियाँ बहुमूल्य नष्ट न कर दे, फिर क्या होगा  मेरे इन भावों का मूल्य?

इतने ऊँचे उठो – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है। देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से जाति भेद की, धर्म-वेश की काले गोरे रंग-द्वेष की ज्वालाओं से जलते जग में इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है॥

वो पल आँसू दे जाते हैं – सोमिल जैन ‘सोमू’

वो पल आँसू दे जाते हैं  हम कई यादे छोड़ जाते हैं कई अधूरी बातें छोड़ जाते हैं ।।।।। जो न हुयी, शायद न होनी थी, वो मुलाकातें छोड़ जाते हैं।

इस वतन के वास्ते – सोमिल जैन ‘सोमू’

जर जमीन एक करदी,इस वतन के वास्ते। खून से कस्तियाँ लिख दी,इस वतन के वास्ते। हँसते हँसते सूली चढ़ गये, इस वतन के वास्ते।

चल मरदाने – हरिवंशराय बच्चन

चल मरदाने, सीना ताने, हाथ हिलाते, पाँव बढ़ाते, मन मुसकाते, गाते गीत।

उठो, धरा के अमर सपूतों – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो। जन-जन के जीवन में फिर से नव स्फूर्ति, नव प्राण भरो।

हम ऐसे आज़ाद हमारा झंडा है बादल – हरिवंशराय बच्चन

हम ऐसे आज़ाद हमारा झंडा है बादल। चाँदी सोने हीरे मोती से सजती गुड़ियाँ। इनसे आतंकित करने की बीत गई घड़ियाँ इनसे सज धज बैठा करते जो हैं कठपुतले हमने तोड़ अभी फेंकी हैं बेड़ी हथकड़ियाँ

जिहि फन फुत्कार उड़त पहाड़ भार – भूषण

जिहि फन फुत्कार उड़त पहाड़ भार,            कूरम कठिन जनु कमल बिदगिलो.