मेरे नगपति! मेरे विशाल – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

मेरे नगपति! मेरे विशाल! साकार, दिव्य, गौरव विराट्, पौरुष के पुन्जीभूत ज्वाल! मेरी जननी के हिम-किरीट! मेरे भारत के दिव्य भाल! मेरे नगपति! मेरे विशाल!

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राजा वसन्त वर्षा ऋतुओं की रानी – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

राजा वसन्त वर्षा ऋतुओं की रानी लेकिन दोनों की कितनी भिन्न कहानी राजा के मुख में हँसी कण्ठ में माला रानी का अन्तर द्रवित दृगों में पानी डोलती सुरभि राजा घर कोने कोने परियाँ सेवा में खड़ी सजा कर दोने खोले अंचल रानी व्याकुल सी आई उमड़ी जाने क्या व्यथा लगी वह रोने

शोक की संतान – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

हृदय छोटा हो, तो शोक वहां नहीं समाएगा। और दर्द दस्तक दिये बिना दरवाजे से लौट जाएगा। टीस उसे उठती है, जिसका भाग्य खुलता है। वेदना गोद में उठाकर सबको निहाल नहीं करती,

लोहे के पेड़ हरे होंगे – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

लोहे के पेड़ हरे होंगे,  तू गान प्रेम का गाता चल, नम होगी यह मिट्टी ज़रूर,  आँसू के कण बरसाता चल। सिसकियों और चीत्कारों से, जितना भी हो आकाश भरा, कंकालों क हो ढेर, खप्परों से चाहे हो पटी धरा । आशा के स्वर का भार,  पवन को लेकिन, लेना ही होगा,

जब आग लगे – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

सीखो नित नूतन ज्ञान,नई परिभाषाएं, जब आग लगे,गहरी समाधि में रम जाओ; या सिर के बल हो खडे परिक्रमा में घूमो। ढब और कौन हैं चतुर बुद्धि-बाजीगर के? गांधी को उल्‍टा घिसो और जो धूल झरे, उसके प्रलेप से अपनी कुण्‍ठा के मुख पर, ऐसी नक्‍काशी गढो कि जो देखे, बोले, आखिर , बापू भी और बात क्‍या कहते थे?

भगवान के डाकिए – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

पक्षी और बादल, ये भगवान के डाकिए हैं जो एक महादेश से दूसरें महादेश को जाते हैं। हम तो समझ नहीं पाते हैं मगर उनकी लाई चिट्ठियाँ पेड़, पौधे, पानी और पहाड़ बाँचते हैं।

भारत – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

सीखे नित नूतन ज्ञान,नई परिभाषाएं, जब आग लगे,गहरी समाधि में रम जाओ; या सिर के बल हो खडे परिक्रमा में घूमो। ढब और कौन हैं चतुर बुद्धि-बाजीगर के? गांधी को उल्‍टा घिसो और जो धूल झरे, उसके प्रलेप से अपनी कुण्‍ठा के मुख पर, ऐसी नक्‍काशी गढो कि जो देखे, बोले, आखिर , बापू भी और बात क्‍या कहते थे?

चांद एक दिन – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

हठ कर बैठा चांद एक दिन, माता से यह बोला सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला सन-सन चलती हवा रात भर जाड़े से मरता हूँ ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ। आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का न हो अगर तो ला दो कुर्ता ही को भाड़े का बच्चे की सुन बात, कहा माता ने 'अरे सलोने` कुशल करे भगवान, लगे मत तुझको जादू टोने।

करघा – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

हर ज़िन्दगी कहीं न कहीं दूसरी ज़िन्दगी से टकराती है। हर ज़िन्दगी किसी न किसी ज़िन्दगी से मिल कर एक हो जाती है । ज़िन्दगी ज़िन्दगी से इतनी जगहों पर मिलती है कि हम कुछ समझ नहीं पाते और कह बैठते हैं यह भारी झमेला है। संसार संसार नहीं, बेवकूफ़ियों का मेला है।

पर्वतारोही – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

मैं पर्वतारोही हूँ। शिखर अभी दूर है। और मेरी साँस फूलनें लगी है। मुड़ कर देखता हूँ कि मैनें जो निशान बनाये थे, वे हैं या नहीं। मैंने जो बीज गिराये थे, उनका क्या हुआ?