पूसी बिल्ली – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

पूसी बिल्ली, पूसी बिल्ली कहाँ गई थी? राजधानी देखने मैं दिल्ली गई थी!

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चल मेरी ढोलकी – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

चल मेरी ढोलकी ढमाक-ढम, नानी के घर जाते हम। चल मेरी ढोलकी ढमाक-ढम नहीं रुकेंगे कहीं भी हम!

हाथी-हाथी – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

हाथी-हाथी बाल दे, लोहे की दीवाल दे। हाथी-हाथी बाल दे, चाँदी की चौपाल दे।

भालू आया – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

लाठी लेकर भालू आया छम-छम छम-छम छम-छम-छम डुग-डुग डुग-डुग बजी डुगडुगी डम-डम डम-डम डम-डम-डम

मुन्ना-मुन्नी – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

मुन्ना-मुन्नी ओढ़े चुन्नी, गुड़िया खूब सजाई किस गुड्डे के साथ हुई तय इसी आज सगाई मुन्ना-मुन्नी ओढ़े चुन्नी, कौन खुशी की बात है, आज तुम्हारी गुड़िया प्यारी की क्या चढ़ी बरात है!

माँ! यह वसंत ऋतुराज री! – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

आया लेकर नव साज री ! मह-मह-मह डाली महक रही कुहु-कुहु-कुहु कोयल कुहुक रही संदेश मधुर जगती को वह देती वसंत का आज री! माँ! यह वसंत ऋतुराज री!

जनिया, घूम रही हो कहाँ – ज्ञान प्रकाश सिंह

जनिया, घूम रही हो कहाँ कि पहिने पीत चुनरिया ना।  मनवा तड़प रहा है जैसे जल के बिना मछरिया ना।     सावन मास मेघ घिरि आये, रिम झिम परत फुहरिया,   नाले ताले सब उतराये, भर गई डगर डगरिया।   दसों दिशाएँ लोकित होतीं,जब जब बिजुरी चमके घन में,   जैसे पूर्ण चन्द्र में चमके, बाला तोर सजनिया ना। 

एकाकी चिड़िया – ज्ञान प्रकाश सिंह

वह छोटी एकाकी चिड़िया  बिलकुल हलकी  दो अंगुल की परम सुंदरी, पीत वर्ण की मेरे उपवन में है रहती।  दिन में इधर उधर उड़ती है संध्या को वापस आ जाती 

ख़ुश रखने की कोशिश – ज्ञान प्रकाश सिंह

ख़ुश रखने की कोशिश मैने बहुत की लेकिन  ख़फ़ा हो जाते हैं लोग, कुछ बात ऐसी हो जाती।  भँवरा उदास है देखकर चमन का सूखा मंजर  बिगड़ता क्या बहारों का, अगर थोड़ा ठहर जाती।

ये सड़कें – ज्ञान प्रकाश सिंह

अट्ठाइस चक्के वाले ट्रक  चलते सड़कों के सीने पर  एक साथ बहुतेरे आते  हैं दहाड़ते  रौंदा करते  तब चिल्लाती हैं ये सड़कें और कभी जब अट्ठहास करते बुलडोजर दौड़ लगाते उनके ऊपर