यादे-ग़ज़ालचश्मां – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

यादे-ग़ज़ालचश्मां, ज़िक्रे-समनइज़ारां जब चाहा कर लिया है कुंजे-क़फ़स बहारां  आंखों में दर्दमंदी, होंठों पे उज़्रख़्वाही जानाना-वार आई शामे-फ़िराक़े-यारां 

वो अहदे-ग़म – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

वो अहदे-ग़म की काहिशहा-ए-बेहासिल को क्या समझे जो उनकी मुख़्त्सर रूदाद भी सब्र-आज़मा समझे  यहां वाबस्तगी, वां बरहमी, क्या जानिये क्यों है न हम अपनी नज़र समझे, न हम उनकी अदा समझे 

बहार आई – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

बहार आई तो जैसे एक बार लौट आये हैं फिर अदम से वो ख़्वाब सारे, शबाब सारे जो तेरे होंठों पे मर मिटे थे जो मिट के हर बार फिर जीये थे निखर गये हैं गुलाब सारे जो तेरी यादों से मुश्कबू हैं

तेरे ग़म को जाँ की तलाश थी – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

तेरे ग़म को जाँ की तलाश थी तेरे जाँ-निसार चले गये तेरी राह में करते थे सर तलब सर-ए-राह-गुज़ार चले गये तेरी कज़ -अदाई से हार के शब-ए-इंतज़ार चली गई मेरे ज़ब्त-ए-हाल से रूठ कर मेरे ग़म-गुसार चले गये

रक़ीब से – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

आ, के वाबस्तः हैं उस हुस्न की यादें तुझ से  जिसने इस दिल को परीखानः बना रखा था  जिसकी उल्फ़त में भुला रखी थी दुनिया हमने  दह्र को दह्र का अफ़साना बना रखा था  आशना हैं तेरे क़दमों से वो राहें जिन पर  उसकी मदहोश जवानी ने इ’नायत की है  कारवाँ गुज़रे हैं जिनसे उसी रा'नाई के  जिसकी इन आँखों ने बे-सूद इ’बादत की है

आज बाज़ार में पा-ब-जौला चलो – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

आज बाज़ार में पा-ब-जौला चलो चश्म-ए-नम जान-ए-शोरीदा काफी नहीं तोहमत-ए-इश्क़ पोशीदा काफी नहीं आज बाज़ार में पा-ब-जौला चलो दस्त-अफ्शां चलो, मस्त-ओ-रक़्सां चलो खाक-बर-सर चलो, खूं-ब-दामां चलो राह तकता है सब शहर-ए-जानां चलो

निसार मैं तेरी गलियों के अए वतन – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

निसार मैं तेरी गलियों के अए वतन, कि जहाँ चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले जो कोई चाहनेवाला तवाफ़ को निकले नज़र चुरा के चले, जिस्म-ओ-जाँ बचा के चले

तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं हदीस-ए-यार के उनवाँ निखरने लगते हैं तो हर हरीम में गेसू सँवरने लगते हैं हर अजनबी हमें महरम दिखाई देता है जो अब भी तेरी गली गली से गुज़रने लगते हैं

ढाका से वापसी पर – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

हम केः ठहरे अजनबी इतनी मदारातों[1] के बाद  फिर बनेंगे आशना[2] कितनी मुलाक़ातों के बाद  कब नज़र में आयेगी बे-दाग़ सब्ज़े की बहार  ख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद 

ख़ुर्शीद-ए-महशर की लौ – फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’

आज के दिन न पूछो मेरे दोस्तो दूर कितने हैं ख़ुशियाँ मनाने के दिन खुल के हँसने के दिन गीत गाने के दिन प्यार करने के दिन दिल लगाने के दिन