हमारे कृषक – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

जेठ हो कि हो पूस, हमारे कृषकों को आराम नहीं है  छूटे कभी संग बैलों का ऐसा कोई याम नहीं है  मुख में जीभ शक्ति भुजा में जीवन में सुख का नाम नहीं है  वसन कहाँ? सूखी रोटी भी मिलती दोनों शाम नहीं है  बैलों के ये बंधू वर्ष भर क्या जाने कैसे जीते हैं  बंधी जीभ, आँखें विषम गम खा शायद आँसू पीते हैं  पर शिशु का क्या, सीख न पाया अभी जो आँसू पीना  चूस-चूस सूखा स्तन माँ का, सो जाता रो-विलप नगीना 

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हो गई मौन – हरिवंशराय बच्चन

हो गई मौन बुलबुले-हिंद! मधुबन की सहसा रुकी साँस, सब तरुवर-शाखाएँ उदास, अपने अंतर का स्वर खोकर बैठे हैं सब अलि विहग-वृंद! चुप हुई आज बुलबुले-हिन्द!

कलम या कि तलवार – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

दो में से क्या तुम्हे चाहिए कलम या कि तलवार  मन में ऊँचे भाव कि तन में शक्ति विजय अपार अंध कक्ष में बैठ रचोगे ऊँचे मीठे गान या तलवार पकड़ जीतोगे बाहर का मैदान कलम देश की बड़ी शक्ति है भाव जगाने वाली,  दिल की नहीं दिमागों में भी आग लगाने वाली 

हमसे छल कीनो काना नेनवा लगायके – सूरदास

हमसे छल कीनो काना नेनवा लगायके  जमुनाजलमें जीपें गेंद डारी कालि नागनाथ लाये ।  इंद्रको गुमान हर्यो गोवरधन धारके  मोर मुगुट बांधे काली कामरी खांदे । 

माध्यम – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

मैं माध्यम हूँ, मौलिक विचार नहीं, कनफ़्युशियस ने कहा । तो मौलिक विचार कहाँ मिलते हैं, खिले हुए फूल ही नए वृन्तों पर दुबारा खिलते हैं ।

सावरे मोकु रंगमें बोरी बोरी – सूरदास

सावरे मोकु रंगमें बोरी बोरी सांवरे मोकुं रंगमें बोरी बोरी बहीयां पकर कर शीरकी गागरिया । छिन गागर ढोरी । रंगमें रस बस मोकूं किनी । डारी गुलालनकी झोरी । गावत लागे मुखसे होरी आयो अचानक मिले मंदिरमें । देखत नवल किशोरी । धरी भूजा मोकुं पकरी जीवनने बलजोरे । माला मोतियनकी तोरी तब मोरे जोर कछु न चालो । बात कठीन सुनाई

व्याल-विजय – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

झूमें झर चरण के नीचे मैं उमंग में गाऊँ. तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।  यह बाँसुरी बजी माया के मुकुलित आकुंचन में, यह बाँसुरी बजी अविनाशी के संदेह गहन में  अस्तित्वों के अनस्तित्व में,महाशांति के तल में, यह बाँसुरी बजी शून्यासन की समाधि निश्चल में। 

दरसन बिना तरसत मोरी अखियां – सूरदास

दरसन बिना तरसत मोरी अखियां  तुमी पिया मोही छांड सीधारे फरकन लागी छतिया  बस्ति छाड उज्जड किनी व्याकुल भई सब सखियां  सूरदास कहे प्रभु तुमारे मिलनकूं ज्युजलंती मुख बतिया 

अवकाश वाली सभ्यता – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

मैं रात के अँधेरे में सिताओं की ओर देखता हूँ  जिन की रोशनी भविष्य की ओर जाती है अनागत से मुझे यह खबर आती है  की चाहे लाख बदल जाये मगर भारत भारत रहेगा जो ज्योति दुनिया में  बुझी जा रही है वह भारत के दाहिने करतल पर जलेगी  यंत्रों से थकी हुयी धरती  उस रोशनी में चलेगी

रोटी और स्वाधीनता – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

आजादी तो मिल गई, मगर, यह गौरव कहाँ जुगाएगा ? मरभुखे ! इसे घबराहट में तू बेच न तो खा जाएगा ? आजादी रोटी नहीं, मगर, दोनों में कोई वैर नहीं, पर कहीं भूख बेताब हुई तो आजादी की खैर नहीं।