मेरे नगपति! मेरे विशाल – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

मेरे नगपति! मेरे विशाल! साकार, दिव्य, गौरव विराट्, पौरुष के पुन्जीभूत ज्वाल! मेरी जननी के हिम-किरीट! मेरे भारत के दिव्य भाल! मेरे नगपति! मेरे विशाल!

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नेक चलो नंदरानी उहां लगी – सूरदास

नेक चलो नंदरानी उहां लगी नेक चलो नंदारानी ॥ देखो आपने सुतकी करनी दूध मिलावत पानी ॥ हमरे शिरकी नयी चुनरिया ले गोरसमें सानी ॥ हमरे उनके करन बाद है हम देखावत जबानी ॥

राजा वसन्त वर्षा ऋतुओं की रानी – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

राजा वसन्त वर्षा ऋतुओं की रानी लेकिन दोनों की कितनी भिन्न कहानी राजा के मुख में हँसी कण्ठ में माला रानी का अन्तर द्रवित दृगों में पानी डोलती सुरभि राजा घर कोने कोने परियाँ सेवा में खड़ी सजा कर दोने खोले अंचल रानी व्याकुल सी आई उमड़ी जाने क्या व्यथा लगी वह रोने

ऐसे भक्ति मोहे भावे उद्धवजी – सूरदास

ऐसे भक्ति मोहे भावे उद्धवजी ऐसी भक्ति ।  सरवस त्याग मगन होय नाचे जनम करम गुन गावे ॥  कथनी कथे निरंतर मेरी चरन कमल चित लावे ॥  मुख मुरली नयन जलधारा करसे ताल बजावे ॥

जागो पीतम प्यारा लाल – सूरदास

जागो पीतम प्यारा लाल तुम जागो बन्सिवाला ।  तुमसे मेरो मन लाग रह्यो तुम जागो मुरलीवाला ॥ बनकी चिडीयां चौं चौं बोले पंछी करे पुकारा ।  रजनि बित और भोर भयो है गरगर खुल्या कमरा ॥

साल मुबारक! – कुमार विश्वास

उम्र बाँटने वाले उस ठरकी बूढ़े ने दिन लपेट कर भेज दिए हैं नए कैलेंडर की चादर में इनमें कुछ तो ऐसे होंगे जो हम दोनों के साझे हों। सब से पहले उन्हें छाँट कर गिन तो लूँ मैं!

शोक की संतान – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

हृदय छोटा हो, तो शोक वहां नहीं समाएगा। और दर्द दस्तक दिये बिना दरवाजे से लौट जाएगा। टीस उसे उठती है, जिसका भाग्य खुलता है। वेदना गोद में उठाकर सबको निहाल नहीं करती,

लोहे के पेड़ हरे होंगे – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

लोहे के पेड़ हरे होंगे,  तू गान प्रेम का गाता चल, नम होगी यह मिट्टी ज़रूर,  आँसू के कण बरसाता चल। सिसकियों और चीत्कारों से, जितना भी हो आकाश भरा, कंकालों क हो ढेर, खप्परों से चाहे हो पटी धरा । आशा के स्वर का भार,  पवन को लेकिन, लेना ही होगा,

जब आग लगे – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

सीखो नित नूतन ज्ञान,नई परिभाषाएं, जब आग लगे,गहरी समाधि में रम जाओ; या सिर के बल हो खडे परिक्रमा में घूमो। ढब और कौन हैं चतुर बुद्धि-बाजीगर के? गांधी को उल्‍टा घिसो और जो धूल झरे, उसके प्रलेप से अपनी कुण्‍ठा के मुख पर, ऐसी नक्‍काशी गढो कि जो देखे, बोले, आखिर , बापू भी और बात क्‍या कहते थे?

भगवान के डाकिए – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

पक्षी और बादल, ये भगवान के डाकिए हैं जो एक महादेश से दूसरें महादेश को जाते हैं। हम तो समझ नहीं पाते हैं मगर उनकी लाई चिट्ठियाँ पेड़, पौधे, पानी और पहाड़ बाँचते हैं।