अभीप्सा – विकास कुमार

भरी दोपहरी गर्म रेत तपते मरुथल बढ़ती पिपासा मरुधान हैं जिस ओर रे मन चल उस ओर

कविता – विकास कुमार

कल कल करती नदियों में मृदुभाव ह्र्दय के बहते हैं प्रेमकाज मृदु शब्द सुनहरे परमारथ मेँ कहते हैं लेखन का लेख बने ये कभी कभी युगलों की प्यास  बुझाते हैं नव आशा संचार लिये ह्रदय का संताप मिटाते हैं

पहचान में तेरे प्रिये – बिकाश पाण्डेय

तुम सदा वे ही रहे जो पास मेरे ना रहा, कभी यादों की हुक तो, कभी अनछुआ सपना रहा | कैसे कहूं की विह्वल हूँ आज फिर किस के लिए ? ये जन्म भी कट जाएगा पहचान में तेरे प्रिये..

जिंदगी – विकास कुमार

वक्त के पायदानों पर दुपाये खड़ी है जिंदगी रेत के मानिंद हथेली से फिसलती जिंदगी जागकर नहाई धोई और चल पड़ी है जिंदगी उबड़ खाबड़ रास्ते औऱ सड़कों पर दौड़ती जिंदगी

औरत हुँ मैं – प्रिया आर्य “दीवानी’

नदी की गहराई में छुपी मिट्टी हुँ मैं जिस साँचे में डालो, ढल जाती हुँ मैं…..   आँशुयो की बेमौसम बरसात हुँ मैं दिल का दर्द सहने में पत्थर हुँ मैं…..

बदलाव – रुचिका मान ‘रूह’

ये कैसा विमूढ़ता का पुलिंदा लिये बैठे हो? सुना नहीं तुमने कि शहर बदल रहा है? ऐसे निरीह कब हुए तुम? यहां की रिवायतों से इतने अनजान तो कभी नहीं थे... तुम तो उत्साहित थे.... नव- उत्तेजना का दौर है,

वो एक दिन – रुचिका मान ‘रूह’

एक दिन जब हम साथ न रहेंगे, और तुम्हे अनायास ही मेरा ख़याल आएगा, हताश मत होना.  तुम मुझे वहीं पाओगे

the last letter – कुमार शान्तनु

आज कल दुनिया में कुछ ऐसा उठ रहा है तूफ़ान, की बात बात पर "हक़" मांग बैठता है हर इंसान।

तेरी मेरी बातें – सोमिल जैन ‘सोमू’

तेरी मेरी बातें... चलो कुछ बात करते हैं चुप्पी को तोड़ते हैं दरमिया तेरे मेरे दिल की बातो को टटोलते हैं मोसम तो खुशनुमा है मगर ये सन्नाटा क्यों है तेरे मेरे बीच में कम्बक्त ये आता क्यों है चलो इस सन्नाटे को खोल लेते है चलो कुछ बोल लेते हैं।

मेरी कहानी – सोमिल जैन ‘सोमू’

पूछता हूँ ये समां से,पूछता हूँ ये अमां से। यदि फुर्सत हो तुम्हें तो,पूछता हूँ ये जमां से। क्या यही मेरी कहानी क्यों सजा आँखों में पानी... मैं भी था एक सुखी मानुष,थोड़ा चंचल बहुत ख्वाहिश। मिले सब संयोग मुझको,मगर ये क्या हुआ तुझको। एक दिन सब टूट बिखरा,अंधकारी सूर्य उखरा। छोड़ कर चल दिए मुझको ,सम्हालेगा कौन मुझको। आज हारा हूँ कभी में,जो न होता खेल खेला। पूछता हूँ हाथ मेरा,छोड़ क्यों छोड़ा अकेला। ले ली सबने साँस ठण्डी,भूलकर जलती कहानी। आग है उर में मेरे,क्यों सजा आँखों में पानी।