इतने ऊँचे उठो – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है। देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से जाति भेद की, धर्म-वेश की काले गोरे रंग-द्वेष की ज्वालाओं से जलते जग में इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है॥

वो पल आँसू दे जाते हैं – सोमिल जैन ‘सोमू’

वो पल आँसू दे जाते हैं  हम कई यादे छोड़ जाते हैं कई अधूरी बातें छोड़ जाते हैं ।।।।। जो न हुयी, शायद न होनी थी, वो मुलाकातें छोड़ जाते हैं।

इस वतन के वास्ते – सोमिल जैन ‘सोमू’

जर जमीन एक करदी,इस वतन के वास्ते। खून से कस्तियाँ लिख दी,इस वतन के वास्ते। हँसते हँसते सूली चढ़ गये, इस वतन के वास्ते।

पड़ोसी से – अटल बिहारी वाजपेयी

एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते, पर स्वतन्त्र भारत का मस्तक नहीं झुकेगा। अगणित बलिदानो से अर्जित यह स्वतन्त्रता, अश्रु स्वेद शोणित से सिंचित यह स्वतन्त्रता। त्याग तेज तपबल से रक्षित यह स्वतन्त्रता, दु:खी मनुजता के हित अर्पित यह स्वतन्त्रता।

दूध में दरार पड़ गई – अटल बिहारी वाजपेयी

ख़ून क्यों सफ़ेद हो गया? भेद में अभेद खो गया। बँट गये शहीद, गीत कट गए, कलेजे में कटार दड़ गई। दूध में दरार पड़ गई।

क्षमा याचना – अटल बिहारी वाजपेयी

क्षमा करो बापू! तुम हमको, बचन भंग के हम अपराधी, राजघाट को किया अपावन, मंज़िल भूले, यात्रा आधी।

झुक नहीं सकते – अटल बिहारी वाजपेयी

टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते सत्य का संघर्ष सत्ता से न्याय लड़ता निरंकुशता से अंधेरे ने दी चुनौती है किरण अंतिम अस्त होती है

भारत जमीन का टुकड़ा नहीं – अटल बिहारी वाजपेयी

भारत जमीन का टुकड़ा नहीं, जीता जागता राष्ट्रपुरुष है। हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है, पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।

चल मरदाने – हरिवंशराय बच्चन

चल मरदाने, सीना ताने, हाथ हिलाते, पाँव बढ़ाते, मन मुसकाते, गाते गीत।

उठो, धरा के अमर सपूतों – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो। जन-जन के जीवन में फिर से नव स्फूर्ति, नव प्राण भरो।