सब जीवन बीता जाता है – जयशंकर प्रसाद

सब जीवन बीता जाता है धूप छाँह के खेल सदॄश सब जीवन बीता जाता है समय भागता है प्रतिक्षण में, नव-अतीत के तुषार-कण में, हमें लगा कर भविष्य-रण में, आप कहाँ छिप जाता है सब जीवन बीता जाता है

आत्‍मकथ्‍य – जयशंकर प्रसाद

मधुप गुन-गुनाकर कह जाता कौन कहानी अपनी यह, मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी। इस गंभीर अनंत-नीलिमा में असंख्‍य जीवन-इतिहास यह लो, करते ही रहते हैं अपने व्‍यंग्‍य मलिन उपहास तब भी कहते हो-कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती। तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे-यह गागर रीती।

अरुण यह मधुमय देश हमारा – जयशंकर प्रसाद

अरुण यह मधुमय देश हमारा। जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।। सरल तामरस गर्भ विभा पर, नाच रही तरुशिखा मनोहर। छिटका जीवन हरियाली पर, मंगल कुंकुम सारा।।

भारत महिमा – जयशंकर प्रसाद

हिमालय के आँगन में उसे, प्रथम किरणों का दे उपहार उषा ने हँस अभिनंदन किया और पहनाया हीरक-हार जगे हम, लगे जगाने विश्व, लोक में फैला फिर आलोक व्योम-तम पुँज हुआ तब नष्ट, अखिल संसृति हो उठी अशोक

तुम कनक किरन – जयशंकर प्रसाद

तुम कनक किरन के अंतराल में लुक छिप कर चलते हो क्यों ? नत मस्तक गवर् वहन करते यौवन के घन रस कन झरते हे लाज भरे सौंदर्य बता दो मोन बने रहते हो क्यो?

प्रयाणगीत – जयशंकर प्रसाद

हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो, प्रशस्त पुण्य पंथ हैं - बढ़े चलो बढ़े चलो।

दो बूँदें – जयशंकर प्रसाद

शरद का सुंदर नीलाकाश निशा निखरी, था निर्मल हास बह रही छाया पथ में स्वच्छ सुधा सरिता लेती उच्छ्वास

बीती विभावरी जाग री – जयशंकर प्रसाद

बीती विभावरी जाग री! अम्बर पनघट में डुबो रही तारा-घट ऊषा नागरी!

आह! वेदना मिली विदाई – जयशंकर प्रसाद

आह! वेदना मिली विदाई मैंने भ्रमवश जीवन संचित, मधुकरियों की भीख लुटाई छलछल थे संध्या के श्रमकण आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण मेरी यात्रा पर लेती थी नीरवता अनंत अँगड़ाई

चित्राधार – जयशंकर प्रसाद

पुन्य औ पाप न जान्यो जात। सब तेरे ही काज करत है और न उन्हे सिरात ॥ सखा होय सुभ सीख देत कोउ काहू को मन लाय। सो तुमरोही काज सँवारत ताकों बड़ो बनाय॥ भारत सिंह शिकारी बन-बन मृगया को आमोद। सरल जीव की रक्षा तिनसे होत तिहारे गोद॥ स्वारथ औ परमारथ सबही तेरी स्वारथ मीत। तब इतनी टेढी भृकुटी क्यों? देहु चरण में प्रीत॥