एक उम्र के बाद रोया नहीं जाता – विकाश कुमार

एक उम्र के बाद रोया नहीं जाता आँख में रहता है अश्क़, ज़ाया नहीं जाता नींद आती थी कभी अब आती नहीं एक उम्र हुयी ख़्वाबों से वो साया नहीं जाता

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जवानी – माखनलाल चतुर्वेदी

प्राण अन्तर में लिये, पागल जवानी ! कौन कहता है कि तू विधवा हुई, खो आज पानी?

कृतज्ञता – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

माली की डाली के बिकसे कुसुम बिलोक एक बाला। बोली ऐ मति भोले कुसुमो खल से तुम्हें पड़ा पाला। विकसित होते ही वह नित आ तुम्हें तोड़ ले जाता है। उदर-परायणता वश पामर तनिक दया नहिं लाता है

चपला – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

चपले! क्यों चमक-चमक कर मेघों में छिप जाती हो? क्यों रूप-छटा तुम अपनी दिखला कर भग जाती हो?॥1॥

कायकूं बहार परी – सूरदास

कायकूं बहार परी । मुरलीया ॥ कायकू ब०॥ध्रु०॥ जेलो तेरी ज्यानी पग पछानी । आई बनकी लकरी मुरलिया ॥ कायकु

सच ये है बेकार हमें ग़म होता है  – जावेद अख़्तर

सच ये है बेकार हमें ग़म होता है  जो चाहा था दुनिया में कम होता है  ढलता सूरज फैला जंगल रस्ता गुम  हमसे पूछो कैसा आलम होता है 

बलि-पन्थी से – माखनलाल चतुर्वेदी

कौन पथ भूले, कि आये ! स्नेह मुझसे दूर रहकर मत व्यर्थ पुकारे शूल-शूल, कह फूल-फूल, सह फूल-फूल। हरि को ही-तल में बन्द किये, केहरि से कह नख हूल-हूल।

बन-कुसुम – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

एक कुसुम कमनीय म्लान हो सूख विखर कर। पड़ा हुआ था धूल भरा अवनीतल ऊपर। उसे देख कर एक सुजन का जी भर आया। वह कातरता सहित वचन यह मुख पर लाया

निर्झर – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

ओ निर्झर! झर्-झर्-झर्, कल-कल करता बता रहता तू, प्रतिपल क्यों अविरल?॥1॥

फुलनको महल फुलनकी सज्या – सूरदास

फुलनको महल फुलनकी सज्या फुले कुंजबिहारी । फुली राधा प्यारी ॥ध्रु०॥ फुलेवे दंपती नवल मनन फुले फले करे केली न्यारी ॥१॥