माँ! यह वसंत ऋतुराज री! – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

आया लेकर नव साज री ! मह-मह-मह डाली महक रही कुहु-कुहु-कुहु कोयल कुहुक रही संदेश मधुर जगती को वह देती वसंत का आज री! माँ! यह वसंत ऋतुराज री!

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रोटी और स्वाधीनता – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

आजादी तो मिल गई, मगर, यह गौरव कहाँ जुगाएगा ? मरभुखे ! इसे घबराहट में तू बेच न तो खा जाएगा ? आजादी रोटी नहीं, मगर, दोनों में कोई वैर नहीं, पर कहीं भूख बेताब हुई तो आजादी की खैर नहीं।

वर दे, वीणावादिनि वर दे – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

वर दे, वीणावादिनि वर दे ! प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव         भारत में भर दे ! काट अंध-उर के बंधन-स्तर बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर; कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर         जगमग जग कर दे !

नेननमें लागि रहै – सूरदास

नेननमें लागि रहै गोपाळ नेननमें ॥ध्रु०॥ मैं जमुना जल भरन जात रही भर लाई जंजाल ॥१॥ रुनक झुनक पग नेपुर बाजे चाल चलत गजराज ॥२॥ जमुनाके नीर तीर धेनु चरावे संग लखो लिये ग्वाल ॥३॥ बिन देखे मोही कल न परत है निसदिन रहत बिहाल ॥४॥ लोक लाज कुलकी मरजादा निपट भ्रमका जाल ॥५॥

चिंता – सुभद्रा कुमारी चौहान

लगे आने, हृदय धन से कहा मैंने कि मत आओ। कहीं हो प्रेम में पागल न पथ में ही मचल जाओ॥ कठिन है मार्ग, मुझको मंजिलें वे पार करनीं हैं। उमंगों की तरंगें बढ़ पड़ें शायद फिसल जाओ॥

जनतन्त्र का जन्म – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,  मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;  दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,  सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।  जनता?हां,मिट्टी की अबोध मूरतें वही,  जाडे-पाले की कसक सदा सहनेवाली,  जब अंग-अंग में लगे सांप हो चुस रहे  तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली।

सिपाही – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

वनिता की ममता न हुई, सुत का न मुझे कुछ छोह हुआ, ख्याति, सुयश, सम्मान, विभव का, त्यों ही, कभी न मोह हुआ। जीवन की क्या चहल-पहल है, इसे न मैने पहचाना, सेनापति के एक इशारे पर मिटना केवल जाना। मसि की तो क्या बात? गली की ठिकरी मुझे भुलाती है, जीते जी लड़ मरूं, मरे पर याद किसे फिर आती है? इतिहासों में अमर रहूँ, है एसी मृत्यु नहीं मेरी, विश्व छोड़ जब चला, भुलाते लगती फिर किसको देरी?

तुम हमारे हो – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

नहीं मालूम क्यों यहाँ आया ठोकरें खाते हु‌ए दिन बीते। उठा तो पर न सँभलने पाया गिरा व रह गया आँसू पीते।

देखो माई हलधर गिरधर जोरी – सूरदास

देखो माई हलधर गिरधर जोरी ॥ हलधर हल मुसल कलधारे गिरधर छत्र धरोरी ॥१॥ हलधर ओढे पित पितांबर गिरधर पीत पिछोरी॥२॥ हलधर केहे मेरी कारी कामरी गीरधरने ली चोरी॥३॥ सूरदास प्रभुकी छबि निरखे भाग बडे जीन कोरी॥४॥

चलते समय – सुभद्रा कुमारी चौहान

तुम मुझे पूछते हो ’जाऊँ’? मैं क्या जवाब दूँ, तुम्हीं कहो! ’जा...’ कहते रुकती है जबान किस मुँह से तुमसे कहूँ ’रहो’!!