कहते तो हो तुम सब कि बुत-ए-ग़ालिया – मिर्ज़ा ग़ालिब

कहते तो हो तुम सब कि बुत-ए-ग़ालिया-मू आए  यक मरतबा घबरा के कहो कोई कि वो आए     हूँ कशमकश-ए-नज़ा में हाँ जज़्ब-ए-मोहब्बत  कुछ कह न सकूँ पर वो मिरे पूछने को आए

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कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तूने – मिर्ज़ा ग़ालिब

कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तूने हमनशीं इक तीर मेरे सीने में मारा के हाये हाये वो सब्ज़ा ज़ार हाये मुतर्रा के है ग़ज़ब वो नाज़नीं बुतान-ए-ख़ुदआरा के हाये हाये

क़यामत है कि सुन लैला – मिर्ज़ा ग़ालिब

क़यामत है कि सुन लैला का दश्त-ए-क़ैस में आना  तअज्जुब से वह बोला यूँ भी होता है ज़माने में 

उग रहा है दर-ओ-दीवार – मिर्ज़ा ग़ालिब

उग रहा है दर-ओ-दीवार

आमों की तारीफ़ में – मिर्ज़ा ग़ालिब

हाँ दिल-ए-दर्दमंद ज़म-ज़मा साज़ क्यूँ न खोले दर-ए-ख़ज़िना-ए-राज़ ख़ामे का सफ़्हे पर रवाँ होना शाख़-ए-गुल का है गुल-फ़िशाँ होना

आमद-ए-सैलाब-ए-तूफ़न-ए सदाए आब है – मिर्ज़ा ग़ालिब

आमद-ए सैलाब-ए तूफ़ान-ए सदाए आब है नक़श-ए-पा जो कान में रखता है उंगली जादह से बज़्म-ए-मय वहशत-कदा है किस की चश्म-ए-मस्त का  शीशे में नब्ज़-ए-परी पिन्हाँ है मौज-ए-बादा से

आ कि मेरी जान को क़रार नहीं है – मिर्ज़ा ग़ालिब

आ कि मेरी जान को क़रार नहीं है ताक़ते-बेदादे-इन्तज़ार नहीं है देते हैं जन्नत हयात-ए-दहर के बदले नश्शा बअन्दाज़-ए-ख़ुमार नहीं है

असद’ हम वो जुनूँ-जौलाँ – मिर्ज़ा ग़ालिब

'असद' हम वो जुनूँ-जौलाँ गदा-ए-बे-सर-ओ-पा हैं कि है सर-पंजा-ए-मिज़्गान-ए-आहू पुश्त-ख़ार अपना

अफ़सोस कि दनदां – मिर्ज़ा ग़ालिब

अफ़सोस कि दनदां का किया रिज़क़ फ़लक ने जिन लोगों की थी दर-ख़ुर-ए-अक़्द-ए-गुहर अंगुश्त  काफ़ी है निशानी तिरा छल्ले का न देना  ख़ाली मुझे दिखला के ब-वक़्त-ए-सफ़र अंगुश्त लिखता हूं असद सोज़िश-ए दिल से सुख़न-ए गरम ता रख न सके कोई मिरे हरफ़ पर अनगुशत

ये न थी हमारी क़िस्मत – मिर्ज़ा ग़ालिब

ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाले यार होता अगर और जीते रहते यही इन्तज़ार होता