ज़बान – जावेद अख़्तर

ये आवाज़ों की तस्वीरें कैसे बनी थीं आवाज़ें तस्वीर बनीं या तस्वीरें आवाज़ बनी थीं

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मेरा आँगन मेरा पेड़ – जावेद अख़्तर

मेरा आँगन कितना कुशादा कितना बड़ा था जिसमें मेरे सारे खेल समा जाते थे