आमों की तारीफ़ में – मिर्ज़ा ग़ालिब

हाँ दिल-ए-दर्दमंद ज़म-ज़मा साज़ क्यूँ न खोले दर-ए-ख़ज़िना-ए-राज़ ख़ामे का सफ़्हे पर रवाँ होना शाख़-ए-गुल का है गुल-फ़िशाँ होना

वतन के लिये – कैफ़ि आज़मी

यही तोहफ़ा है यही नज़राना  मैं जो आवारा नज़र लाया हूँ रंग में तेरे मिलाने के लिये क़तरा-ए-ख़ून-ए-जिगर लाया हूँ ऐ गुलाबों के वतन

आमद-ए-सैलाब-ए-तूफ़न-ए सदाए आब है – मिर्ज़ा ग़ालिब

आमद-ए सैलाब-ए तूफ़ान-ए सदाए आब है नक़श-ए-पा जो कान में रखता है उंगली जादह से बज़्म-ए-मय वहशत-कदा है किस की चश्म-ए-मस्त का  शीशे में नब्ज़-ए-परी पिन्हाँ है मौज-ए-बादा से

वक्त ने किया क्या हंसी सितम – कैफ़ि आज़मी

वक्त ने किया क्या हंसी सितम  तुम रहे न तुम, हम रहे न हम । 

आ कि मेरी जान को क़रार नहीं है – मिर्ज़ा ग़ालिब

आ कि मेरी जान को क़रार नहीं है ताक़ते-बेदादे-इन्तज़ार नहीं है देते हैं जन्नत हयात-ए-दहर के बदले नश्शा बअन्दाज़-ए-ख़ुमार नहीं है

असद’ हम वो जुनूँ-जौलाँ – मिर्ज़ा ग़ालिब

'असद' हम वो जुनूँ-जौलाँ गदा-ए-बे-सर-ओ-पा हैं कि है सर-पंजा-ए-मिज़्गान-ए-आहू पुश्त-ख़ार अपना

शायद मैं कभी समझा नहीं पाउँगा – विकाश कुमार

शायद मैं कभी समझा नहीं पाउँगा शायद तुम कभी समझ नहीं पाओगी लबों की ख़ामोशी और दिल का शोर आँखों को फेर लेना दूसरी ओर तूफ़ान अंदर और शब्दों का अभाव तुम्हारे कटाक्ष की पीड़ घनघोर शायद मैं कभी समझा नहीं पाउँगा शायद तुम कभी समझ नहीं पाओगी

अफ़सोस कि दनदां – मिर्ज़ा ग़ालिब

अफ़सोस कि दनदां का किया रिज़क़ फ़लक ने जिन लोगों की थी दर-ख़ुर-ए-अक़्द-ए-गुहर अंगुश्त  काफ़ी है निशानी तिरा छल्ले का न देना  ख़ाली मुझे दिखला के ब-वक़्त-ए-सफ़र अंगुश्त लिखता हूं असद सोज़िश-ए दिल से सुख़न-ए गरम ता रख न सके कोई मिरे हरफ़ पर अनगुशत

लाई फिर इक लग़्ज़िशे-मस्ताना तेरे शहर में – कैफ़ि आज़मी

लाई फिर इक लग़्ज़िशे-मस्ताना तेरे शहर में । फिर बनेंगी मस्जिदें मयख़ाना तेरे शहर में । आज फिर टूटेंगी तेरे घर की नाज़ुक खिड़कियाँ आज फिर देखा गया दीवाना तेरे शहर में ।

ये न थी हमारी क़िस्मत – मिर्ज़ा ग़ालिब

ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाले यार होता अगर और जीते रहते यही इन्तज़ार होता