एक उम्र के बाद रोया नहीं जाता – विकाश कुमार

एक उम्र के बाद रोया नहीं जाता आँख में रहता है अश्क़, ज़ाया नहीं जाता नींद आती थी कभी अब आती नहीं एक उम्र हुयी ख़्वाबों से वो साया नहीं जाता

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सोमनाथ – कैफ़ि आज़मी

बुतशिकन कोई कहीं से भी ना आने पाये हमने कुछ बुत अभी सीने में सजा रक्खे हैं अपनी यादों में बसा रक्खे हैं दिल पे यह सोच के पथराव करो दीवानो कि जहाँ हमने सनम अपने छिपा रक्खे हैं वहीं गज़नी के खुदा रक्खे हैं

कहते तो हो तुम सब कि बुत-ए-ग़ालिया – मिर्ज़ा ग़ालिब

कहते तो हो तुम सब कि बुत-ए-ग़ालिया-मू आए  यक मरतबा घबरा के कहो कोई कि वो आए     हूँ कशमकश-ए-नज़ा में हाँ जज़्ब-ए-मोहब्बत  कुछ कह न सकूँ पर वो मिरे पूछने को आए

सुना करो मेरी जाँ – कैफ़ि आज़मी

सुना करो मेरी जाँ इन से उन से अफ़साने  सब अजनबी हैं यहाँ कौन किस को पहचाने यहाँ से जल्द गुज़र जाओ क़ाफ़िले वालों  हैं मेरी प्यास के फूँके हुए ये वीराने  मेरी जुनून-ए-परस्तिश से तंग आ गये लोग  सुना है बंद किये जा रहे हैं बुत-ख़ाने 

कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तूने – मिर्ज़ा ग़ालिब

कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तूने हमनशीं इक तीर मेरे सीने में मारा के हाये हाये वो सब्ज़ा ज़ार हाये मुतर्रा के है ग़ज़ब वो नाज़नीं बुतान-ए-ख़ुदआरा के हाये हाये

सदियाँ गुजर गयीं – कैफ़ि आज़मी

क्या जाने किसी की प्यास बुझाने किधर गयीं उस सर पे झूम के जो घटाएँ गुज़र गयीं दीवाना पूछता है यह लहरों से बार बार कुछ बस्तियाँ यहाँ थीं बताओ किधर गयीँ

क़यामत है कि सुन लैला – मिर्ज़ा ग़ालिब

क़यामत है कि सुन लैला का दश्त-ए-क़ैस में आना  तअज्जुब से वह बोला यूँ भी होता है ज़माने में 

वो भी सराहने लगे अरबाबे-फ़न के बाद – कैफ़ि आज़मी

वो भी सरहाने लगे अरबाबे-फ़न के बाद । दादे-सुख़न मिली मुझे तर्के-सुखन  के बाद । दीवानावार चाँद से आगे निकल गए ठहरा न दिल कहीं भी तेरी अंजुमन के बाद ।

उग रहा है दर-ओ-दीवार – मिर्ज़ा ग़ालिब

उग रहा है दर-ओ-दीवार

वो कभी धूप कभी छाँव लगे – कैफ़ि आज़मी

वो कभी धूप कभी छाँव लगे । मुझे क्या-क्या न मेरा गाँव लगे । किसी पीपल के तले जा बैठे  अब भी अपना जो कोई दाँव लगे ।