नई सुब्‍ह – कैफ़ि आज़मी

ये सेहत-बख़्श तड़का ये सहर की जल्वा-सामानी उफ़ुक़ सारा बना जाता है दामान-ए-चमन जैसे छलकती रौशनी तारीकियों पे छाई जाती है उड़ाए नाज़ियत की लाश पर कोई कफ़न जैसे उबलती सुर्ख़ियों की ज़द पे हैं हल्क़े सियाही के पड़ी हो आग में बिखरी ग़ुलामी की रसन जैसे

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नया हुस्न – कैफ़ि आज़मी

कितनी रंगीं है फ़ज़ा कितनी हसीं है दुनिया कितना सरशार है ज़ौक़-ए-चमन-आराई आज इस सलीक़े से सजाई गई बज़्म-ए-गीती तू भी दीवार-ए-अजन्ता से उतर आई आज रू-नुमाई की ये साअत ये तही-दस्ती-ए-शौक़ न चुरा सकता हूँ आँखें न मिला सकता हूँ प्यार सौग़ात, वफ़ा नज़्र, मोहब्बत तोहफ़ा यही दौलत तिरे क़दमों पे लुटा सकता हूँ

दाएरा – कैफ़ि आज़मी

रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ बार-हा तोड़ चुका हूँ जिन को उन्हीं दीवारों से टकराता हूँ रोज़ बसते हैं कई शहर नए रोज़ धरती में समा जाते हैं ज़लज़लों में थी ज़रा सी गर्मी वो भी अब रोज़ ही आ जाते हैं

तसव्वुर – कैफ़ि आज़मी

ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो कि जैसे सचमुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू

एक दुआ – कैफ़ि आज़मी

अब और क्या तेरा बीमार बाप देगा तुझे बस एक दुआ कि ख़ुदा तुझको कामयाब करे वो टाँक दे तेरे आँचल में चाँद और तारे तू अपने वास्ते जिस को भी इंतख़ाब करे

तलाश – कैफ़ि आज़मी

ये बुझी सी शाम ये सहमी हुई परछाइयाँ ख़ून-ए-दिल भी इस फ़ज़ा में रंग भर सकता नहीं आ उतर आ काँपते होंटों पे ऐ मायूस आह सक़्फ़-ए-ज़िन्दाँ पर कोई पर्वाज़ कर सकता नहीं झिलमिलाए मेरी पलकों पे मह-ओ-ख़ुर भी तो क्या? इस अन्धेरे घर में इक तारा उतर सकता नहीं

दूसरा बनबास – कैफ़ि आज़मी

राम बन-बास से जब लौट के घर में आए याद जंगल बहुत आया जो नगर में आए रक़्स-ए-दीवानगी आँगन में जो देखा होगा छे दिसम्बर को श्री राम ने सोचा होगा इतने दीवाने कहाँ से मिरे घर में आए जगमगाते थे जहाँ राम के क़दमों के निशाँ प्यार की काहकशाँ लेती थी अंगड़ाई जहाँ मोड़ नफ़रत के उसी राहगुज़र में आए

ताजमहल – कैफ़ि आज़मी

मरमरीं-मरमरीं फूलों से उबलता हीरा चाँद की आँच में दहके हुए सीमीं मीनार ज़ेहन-ए-शाएर से ये करता हुआ चश्मक पैहम एक मलिका का ज़िया-पोश ओ फ़ज़ा-ताब मज़ार

मेरा माज़ी मेरे काँधे पर – कैफ़ि आज़मी

अब तमद्दुन की हो जीत के हार  मेरा माज़ी है अभी तक मेरे काँधे पर सवार आज भी दौड़ के गल्ले में जो मिल जाता हूँ  जाग उठता है मेरे सीने में जंगल कोई  सींग माथे पे उभर आते हैं  पड़ता रहता है मेरे माज़ी का साया मुझ पर दौर-ए-ख़ूँख्वारी से गुज़रा हूँ छिपाऊँ क्यों पर  दाँत सब खून में डूबे नज़र आते हैं 

दोशीज़ा मालन – कैफ़ि आज़मी

लो पौ फटी वो छुप गई तारों की अंजुमन लो जाम-ए-महर से वो छलकने लगी किरन खिंचने लगा निगाह में फ़ितरत का बाँकपन जल्वे ज़मीं पे बरसे ज़मीं बन गई दुल्हन