पत्थर के ख़ुदा – कैफ़ि आज़मी

पत्थर के ख़ुदा वहाँ भी पाए । हम चाँद से आज लौट आए । दीवारें तो हर तरफ़ खड़ी हैं क्या हो गया मेहरबान साए । जंगल की हवाएँ आ रही हैं काग़ज़ का ये शहर उड़ न जाए ।

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झुकी झुकी सी नज़र – कैफ़ि आज़मी

झुकी झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहीं  दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं  तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता  मेरी तरह तेरा दिल बेक़रार है कि नहीं 

हम उन्हें वो हमें भुला बैठे – ख़ुमार बाराबंकवी

हम उन्हें वो हमें भुला बैठे दो गुनहगार ज़हर खा बैठे हाल-ऐ-ग़म कह-कह के ग़म बढ़ा बैठे तीर मारे थे तीर खा बैठे आंधियो जाओ अब आराम करो हम ख़ुद अपना दिया बुझा बैठे

वो सवा याद आये – ख़ुमार बाराबंकवी

वो सवा याद आये भुलाने के बाद  जिंदगी बढ़ गई ज़हर खाने के बाद  दिल सुलगता रहा आशियाने के बाद  आग ठंडी हुई इक ज़माने के बाद  रौशनी के लिए घर जलाना पडा  कैसी ज़ुल्मत बढ़ी तेरे जाने के बाद 

अकेले हैं वो और झुंझला रहे हैं    – ख़ुमार बाराबंकवी

अकेले हैं वो और झुंझला रहे हैं  मेरी याद से जंग फ़रमा रहे हैं  इलाही मेरे दोस्त हों ख़ैरियत से  ये क्यूँ घर में पत्थर नहीं आ रहे हैं 

ग़मे-दुनिया बहुत ईज़ारशाँ है – ख़ुमार बाराबंकवी

ग़मे-दुनिया बहुत ईज़ारशाँ है  कहाँ है ऐ ग़मे-जानाँ! कहाँ है  इक आँसू कह गया सब हाल दिल का मैं समझा था ये ज़ालिम बेज़बाँ है 

मुझ को शिकस्त-ए-दिल   – ख़ुमार बाराबंकवी

मुझ को शिकस्त-ए-दिल का मज़ा याद आ गया  तुम क्यों उदास हो गए क्या याद आ गया  कहने को ज़िन्दगी थी बहुत मुख़्तसर मगर  कुछ यूँ बसर हुई कि ख़ुदा याद आ गया  वाइज़ सलाम ले कि चला मैकदे को मैं  फिरदौस-ए-गुमशुदा का पता याद आ गया 

कर चले हम फ़िदा – कैफ़ि आज़मी

कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियो अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई फिर भी बढ़ते क़दम को न रुकने दिया कट गए सर हमारे तो कुछ ग़म नहीं सर हिमालय का हमने न झुकने दिया

बुझ गया दिल  – ख़ुमार बाराबंकवी

बुझ गया दिल हयात बाक़ी है  छुप गया चाँद रात बाक़ी है  हाले-दिल उन से कह चुके सौ बार  अब भी कहने की बात बाक़ी है 

हिज्र की शब है और उजाला है   – ख़ुमार बाराबंकवी

हिज्र की शब है और उजाला है  क्या तसव्वुर भी लुटने वाला है  ग़म तो है ऐन ज़िन्दगी लेकिन  ग़मगुसारों ने मार डाला है  इश्क़ मज़बूर-ओ-नामुराद सही  फिर भी ज़ालिम का बोल-बाला है