सुना है वो हमें भुलाने लगे है  – ख़ुमार बाराबंकवी

सुना है वो हमें भुलाने लगे है तो क्या हम उन्हे याद आने लगे है हटाए थे जो राह से दोस्तो की तो पत्थर मेरे घर में आने लगे है

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आइना टाल देता है – विकाश कुमार

रोज़ पूछता हूँ कौन है... रोज़ आइना टाल देता है इस साल कुछ बदलेंगे... दिल क़रार हर साल देता है

वो जो आए हयात याद आई  – ख़ुमार बाराबंकवी

वो जो आए हयात याद आई भूली बिसरी सी बात याद आई कि हाल-ए-दिल उनसे कहके जब लौटे उनसे कहने की बात याद आई

वो हमें जिस कदर आज़माते रहे  – ख़ुमार बाराबंकवी

वो हमें जिस कदर आज़माते रहे अपनी ही मुश्किलो को बढ़ाते रहे  थी कमाने तो हाथो में अब यार के तीर अपनो की जानिब से आते रहे 

कभी शेर-ओ-नगमा बनके  – ख़ुमार बाराबंकवी

कभी शेर-ओ-नगमा बनके कभी आँसूओ में ढलके  वो मुझे मिले तो लेकिन, मिले सूरते बदलके कि वफा की सख़्त राहे कि तुम्हारे पाव नाज़ुक  न लो इंतकाम मुझसे मेरे साथ-साथ चलके

ये मिसरा नहीं है  – ख़ुमार बाराबंकवी

ये मिसरा नहीं है वज़ीफा मेरा है खुदा है मुहब्बत, मुहब्बत खुदा है कहूँ किस तरह में कि वो बेवफा है मुझे उसकी मजबूरियों का पता है हवा को बहुत सरकशी का नशा है  मगर ये न भूले दिया भी दिया है

दुनिया के ज़ोर प्यार के दिन याद आ गये  – ख़ुमार बाराबंकवी

दुनिया के ज़ोर प्यार के दिन याद आ गये  दो बाज़ुओ की हार के दिन याद आ गये गुज़रे वो जिस तरफ से बज़ाए महक उठी  सबको भरी बहार के दिन याद आ गये

देख तो दिल कि जाँ से उठता है – मीर तकी “मीर”

देख तो दिल कि जाँ से उठता है ये धुआं सा कहाँ से उठता है गोर किस दिल-जले की है ये फलक शोला इक सुबह याँ से उठता है खाना-ऐ-दिल से ज़िन्हार न जा कोई ऐसे मकान से उठता है

गम रहा जब तक कि दम में दम रहा – मीर तकी “मीर”

ग़म रहा जब तक कि दम में दम रहा दिल के जाने का निहायत ग़म रहा  दिल न पहुँचा गोशा-ए-दामन तलक क़तरा-ए-ख़ूँ था मिज़्हा पे जम रहा

खार-ओ-खस तो उठें, रास्ता तो चले – कैफ़ि आज़मी

खार-ओ-खस तो उठें, रास्ता तो चले मैं अगर थक गया, काफ़ला तो चले चांद, सूरज, बुजुर्गों के नक्श-ए-क़दम खैर बुझने दो उनको हवा तो चले हाकिम-ए-शहर, यह भी कोई शहर है मस्जिदें बंद हैं, मैकदा तो चले