अज़ मेहर ता-ब-ज़र्रा दिल-ओ-दिल है आइना – मिर्ज़ा ग़ालिब

अज़ मेहर ता-ब-ज़र्रा दिल-ओ-दिल है आइना  तूती को शश जिहत से मुक़ाबिल है आइना

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बस इक झिझक है यही – कैफ़ि आज़मी

बस इक झिझक है यही हाल-ए-दिल सुनाने में  कि तेरा ज़िक्र भी आयेगा इस फ़साने में  बरस पड़ी थी जो रुख़ से नक़ाब उठाने में  वो चाँदनी है अभी तक मेरे ग़रीब-ख़ाने में 

पशेमानी – कैफ़ि आज़मी

मैं ये सोच कर उस के दर से उठा था कि वो रोक लेगी मना लेगी मुझको कदम ऐसे अंदाज से उठ रहे थे कि वो आवाज़ देकर बुला लेगी मुझको हवाओं मे लहराता आता था दामन कि दामन पकड़ के बिठा लेगी मुझको

मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं – विकाश कुमार

चादरों पर अब सलवटें नहीं पड़ती कपड़े भी इधर उधर बिखरें नहीं ना नयी फ़रमाहिशे हैं हर दिन रोज़ अब यही कहानी है बच्चों के बिन क्यूँकि मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं

साँझ हुई परदेस में – विकाश कुमार

साँझ हुई परदेस में दिल देश में डूब गया अब इस भागदौड़ से जी अपना ऊब गया वरदान मिलने की चाह नहीं मेहनत का फ़ल ही मिल जाता किसको को क्या मिला यहाँ हिसाब में वक़्त ख़ूब गया

नेहरू – कैफ़ि आज़मी

मैं ने तन्हा कभी उस को देखा नहीं फिर भी जब उस को देखा वो तन्हा मिला जैसे सहरा में चश्मा कहीं या समुन्दर में मीनार-ए-नूर या कोई फ़िक्र-ए-औहाम में फ़िक्र सदियों अकेली अकेली रही ज़ेहन सदियों अकेला अकेला मिला

चलते हैं घड़ी के काँटे – विकाश कुमार

चलते हैं घड़ी के काँटे और काँटों पे चलते हम हर दिन जलने के बाद सूरज से ढलते हम

मेरे घर भी दिवाली है – विकाश कुमार

बना कर दिए मिट्टी के ज़रा सी आस पाली है , ख़रीद लो मेहनत मेरी , मेरे घर भी दिवाली है

पहला सलाम – कैफ़ि आज़मी

एक रंगीन झिझक एक सादा पयाम कैसे भूलूँ किसी का वो पहला सलाम फूल रुख़्सार के रसमसाने लगे हाथ उठा क़दम डगमगाने लगे रंग-सा ख़ाल-ओ-ख़द से छलकने लगा सर से रंगीन आँचल ढलकने लगा

मैं यह सोचकर – कैफ़ि आज़मी

मैं यह सोचकर उसके दर से उठा था कि वह रोक लेगी मना लेगी मुझको । हवाओं में लहराता आता था दामन कि दामन पकड़कर बिठा लेगी मुझको । क़दम ऐसे अंदाज़ से उठ रहे थे कि आवाज़ देकर बुला लेगी मुझको ।