चलते हैं घड़ी के काँटे – विकाश कुमार

चलते हैं घड़ी के काँटे और काँटों पे चलते हम हर दिन जलने के बाद सूरज से ढलते हम

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मेरे घर भी दिवाली है – विकाश कुमार

बना कर दिए मिट्टी के ज़रा सी आस पाली है , ख़रीद लो मेहनत मेरी , मेरे घर भी दिवाली है

क्योंकि एक औरत थी वो – शिवम कनोजे

कभी कोख़ में लड़ी थी वो कभी कोख़ से लड़ी थी वो, कभी चंद रुपयों में बिकी थी वो, कभी दहेज़ के नाम पर ख़रीदी गई थी वो, कभी अपने ही घर में बंधी थी वो, तो कभी औरों के घर की बंदी थी वो, कभी औरों ने उसे सिर का ताज बनाया,

आज शर्मसार हूँ – शिवम कनोजे

हाँ, मैं भारतीय हूँ कभी गर्व था इस बात पर, लेकिन आज शर्मिंदा हूँ, हाँ, कभी गर्व करता था, शहादत पर जवानों की, आज बेमतलब हो गयी वो शहादत, औरों से बचाते रहे,इस देश को, पर अपनों ने ही नोंच खाया, आज शर्मसार हूँ, भारतीय होने पर अपने,

मैं समझ नहीं पाया – शिवम कनोजे

आज मैं किसी से मिला, वो बूढ़ेपन की खीझ थी, या देश पर गुस्सा , मैं समझ नहीं पाया।

उम्मीन्द थी ज़िंदगी से तुम मेरी – शिवम् कनोजे

उम्मीन्द थी ज़िंदगी से तुम मेरी, अब ग़ुरूर हो खुद पर मेरा दर्द था दिल में कुछ मेरे, अब राहत हो दिल की तुम मेरी, दास्तां सुनी थी सच्चे इश्क़ की कुछ, ख़ौफ़नाक थी सारी, सोच बदल दी तुमने मेरी, अब हसीं लगता हैं सब कुछ,

बेनाम रिश्ता – शिवम् कनोजे

यूँ तो वायदे किये थे साथ निभाने के हरदम, उन वायदों ने मुँह फेर लिया, चाहत थी हाथ थामने की उसके , पर उसने हाथ ही यूँ मरोड़ दिया, एक सुकून सा था साथ उसका, आज साथ होना चुभने लगा। कभी दवा थी हर मर्ज़ की वो, आज खुद दर्द बन उभरने लगा।

उसूल-ऐ-ज़िंदगी – शिवम् कनोजे

कुछ ज़िंदगी में अपने होते हैं, तो कुछ ज़िन्दगी के अपने होते हैं, कुछ उसूल समझते है, तो कुछ बे-फ़िज़ूल कहते हैं।

तुम और तुम्हारा शहर – रुचिका मान ‘रूह’

एक अरसे पहले तेरे कूचे से निकले थे हम, अरमानों की उलझी हुई गाँठे लिए, बेवजह चलती हुई साँसों के साथ... और देख तो..एक मुद्दत बाद आज लौटे हैं, वैसा का वैसा ही है सब आज भी यहाँ...

आइना टाल देता है – विकाश कुमार

रोज़ पूछता हूँ कौन है... रोज़ आइना टाल देता है इस साल कुछ बदलेंगे... दिल क़रार हर साल देता है