लाई फिर इक लग़्ज़िशे-मस्ताना तेरे शहर में – कैफ़ि आज़मी

लाई फिर इक लग़्ज़िशे-मस्ताना तेरे शहर में ।
फिर बनेंगी मस्जिदें मयख़ाना तेरे शहर में ।

आज फिर टूटेंगी तेरे घर की नाज़ुक खिड़कियाँ
आज फिर देखा गया दीवाना तेरे शहर में ।

जुर्म है तेरी गली से सर झुकाकर लौटना
कुफ़्र है पथराव से घबराना तेरे शहर में ।

शाहनामे लिक्खे हैं खंडरात की हर ईंट पर
हर जगह है दफ़्न इक अफ़साना तेरे शहर में ।

कुछ कनीज़ें जो हरीमे-नाज़ में हैं बारयाब
माँगती हैं जानो-दिल नज़्राना तेरे शहर में ।

नंगी सड़कों पर भटककर देख, जब मरती है रात
रेंगता है हर तरफ़ वीराना तेरे शहर में ।

– कैफ़ि आज़मी

काव्यशाला द्वारा प्रकाशित रचनाएँ

कैफी के कुछ प्रमुख फिल्मी गीत

    • मैं ये सोच के उसके दर से उठा था।..(हकीकत)

    • है कली-कली के रुख पर तेरे हुस्न का फसाना…(लालारूख)

    • वक्त ने किया क्या हसीं सितम… (कागज के फूल)

    • इक जुर्म करके हमने चाहा था मुस्कुराना… (शमा)

    • जीत ही लेंगे बाजी हम तुम… (शोला और शबनम)

    • तुम पूछते हो इश्क भला है कि नहीं है।.. (नकली नवाब)

    • राह बनी खुद मंजिल… (कोहरा)

    • सारा मोरा कजरा चुराया तूने… (दो दिल)

    • बहारों…मेरा जीवन भी सँवारो… (आखिरी khत)

    • धीरे-धीरे मचल ए दिल-ए-बेकरार… (अनुपमा)

    • या दिल की सुनो दुनिया वालों… (अनुपमा)

    • मिलो न तुम तो हम घबराए… (हीर-रांझा)

    • ये दुनिया ये महफिल… (हीर-रांझा)

    • जरा सी आहट होती है तो दिल पूछता है।.. (हकीकत)

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