कहूँ जो हाल, तो कहते हो – मिर्ज़ा ग़ालिब

कहूं जो हाल तो कहते होमुद्द` कहिये
तुम्हीं कहो कि जो तुम यूं कहो तो क्या कहिये

कहियो `[1] से फिर तुम कि हम सितमगर हैं
मुझे तो ख़ू[2] है कि जो कुछ कहो बजा कहिये[3]

वह नश्तर[4] सही पर दिल में जब उतर जावे
निगाहनाज़[5] को फिर क्यूं आशना[6] कहिये

नहीं ज़रीहाएराहत[7] जराहतपैकां[8]
वह ज़ख़्मतेग़[9] है जिस को कि दिलकुशा[10] कहिये

जो मुद्द`[11] बने उस के मुद्द` बनिये
जो नासज़ा[12] कहे उस को नासज़ा कहिये

कहीं हक़ीक़तजांकाहीमरज़[13] लिखिये
कहीं मुसीबतनासाज़ीदवा[14] कहिये

कभी शिकायत रंज गिरांनिशीं[15] कीजे
कभी हिकायत सब्र गुरेज़पा[16] कहिये

रहे जान तो क़ातिल को ख़ूंबहा[17] दीजे
कटे ज़बान तो ख़ंजर को मरहबा[18] कहिये

नहीं निगार[19] को उल्फ़त हो निगार तो है
रवानीरविश[20]मस्तीअदा कहिये

नहीं बहार को फ़ुरसत हो बहार तो है
तरावतचमन[21] ख़ूबीहवा कहिये

सफ़ीना[22] जब कि किनारे पे लगाग़ालिब
ख़ुदा से क्या सितमजोरनाख़ुदा[23] कहिये

मिर्ज़ा ग़ालिब

1-कटाक्ष; 2-आदत ; 3-हाँ में हाँ मिलाना; 4-बर्छा; 5-अदा भरी नज़र; 6-प्रेमी; 7-चैन का साधन; 8-तीर का घाव;
9-तलवार का घाव; 10-सुखद; 11-दुश्मन; 12-अनुचित बोले; 13-रोग के कष्ट की सच्चाई; 14- दवा के काम न आने की कठिनाई; 15-जम कर बैठ जाने वाले दुःख की शिकायत ; 16-भागने वाले धीरज की कथा ; 17-ख़ून की कीमत;
18- स्वागत करना दुआ देना ; 19-प्रेयसी ;20-मंथर गति की सुँदरता ;21-बाग़ की ताज़गी ; 22-नाव ;23-नाव चलाने वाले की कठोरता और अत्याचार

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