गीत –  ज्ञान प्रकाश सिंह

आज सूर्य की अंतिम किरणें , दुर्बल क्षीण मलिन अलसाई ,
आज नहीं निर्झर के जल में , संध्या रूप निरखने आई ।

आज कुमुदनी क्यों उदास है , धूल भरा आकाश विकल है ,
अन्य दिनों की भाँति प्रकृति का , आज नहीं जीवन चंचल है ।
दम साधे सब वृक्ष खड़े हैं, पर जब तब हो जाते कम्पित ,
खर खर कर पत्ते गिरते , जब उमस लिए बहती पुरवाई ।
आज नहीं निर्झर के जल में  …

आज नहीं वे पंख पखेरू , जो प्रतिदिन आया करते थे ,
कुल कुल कुल के मधुर स्वरों में , जो प्रतिदिन गाया करते थे ।
वन प्रदेश के हर कण कण में , और दूर खेतों के ऊपर ,
अन्य दिनों की भाँति नहीं है , कोयल की स्वर लहरी छाई ।
आज नहीं निर्झर के जल में  …

आज नहीं पनघट के पथ पर, पायल का रुन-झुन रुन-झुन स्वर ,
आज नहीं कोई बाला , जो बातें करती तनिक विहँस कर ।
नीर रिक्त घट अलग पड़े हैं , पर जब तब उच्छ्वासित होते ,
उनकी सों-सों की सी ध्वनि में , विरहानल की पीर समाई ।

आज नहीं निर्झर के जल में  …

                                       – ज्ञान प्रकाश सिंह

 यह कविता लेखक श्री ज्ञान प्रकाश सिंह की पुस्तक ‘स्पर्श” से ली गयी है । पूरी पुस्तक ख़रीदने हेतु निकटतम पुस्तक भंडार जायें । भारती  प्रकाशन  मूल्य रु 200 /-

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