मैं और मेरी कॉफ़ी (कहानी) – कुमार शान्तनु

लव बींस (love beans)

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तनहा सा रहता था मैं इस तनहा शहर में, कभी खुद से छिपता , कभी खुद से मिलता था। अक्सर देर से सोता था , देर से उठता था। न जाने कितने बरस हो गए थे मुझ जैसे आलसी को सुबह सवेरे की दुनिया देखे सुने । आज बैठा हूँ हाथ में कॉफ़ी (coffee-) का मग लिए , जैसे न जाने कितने बरस हुए खुद के साथ इतने इतमिनान के साथ बैठे हुए। कुछ पुरानी बचकानी बातो को याद करता, कभी किसी बात पर खुद ही हँस पड़ता तो कभी आखें नम हो जाती । आज भी वो कैंटीन (canteen) की शरारते, क्लास (class) में एक दूसरे से शरमाने वाले दिन याद आते है । फ़ेसबूक (facebook) नहीं था तब बल्कि फ़ेसबुक (facebook) का मतलब बस फ़ेस (face) के सामने बुक (book) का होना होता था । कोई जीमेल (gmail) वग़ैरह भी नही था, हाँ ख़्वाबों की एक फ़ीमेल (female) थी। जिसे पास की स्टेशनेरी (stationary) से छोटी सी डायरी (diary) ख़रीदकर अपनी कविताएँ लिखकर देता था। वो मेरी कविताओं के उन उलझे शब्दों में खो जाती थी और मैं भी उसकी आँखो को देर तक देखता रहता था । वो देर तक पढ़ती और ‘अच्छा लिखते हो’ कहकर चली जाती और मैं हाथ में कॉफ़ी (coffee) का मग (mug) पकडे उसे देर तक दूर तक देखता रहता।

कॉफ़ी ड्रीम (coffee dream)

कई बार जनवरी (january) की कड़ाके की सदी में , अपने नरम हाथो से कॉफ़ी (coffee) पकड़ाती तो उसकी नरम मुलायम उंगलिया  हाथों को छू जाती थी और फिर महीनो सपने आते थे । वो काली मिर्च , अदरक वाली चाय तो जैसे अब भाती नही थी । और कॉफ़ी (coffee) का मानो मैं आशिक सा हो गया था । कभी दफ्तर की सुबह की कॉफ़ी (coffee)  , कभी शाम कोई गपशप में कॉफ़ी (coffee) तो कभी ऊँची ईमारत पर घर की खिडकी वाली कॉफ़ी (coffee) । मेरा एक दोस्त है चिंटू जो अक्सर कहता था की ज्यादा कॉफ़ी (coffee) अच्छी नही होती और यहाँ ये हाल था की एक रात एक हसीन सा ख्वाब आया या फिर यूँ कहो एक एक अजीब-ओ-ग़रीब ख्याल आया। ख्वाब में मैं उसके पास उसकी हाथो की छोटी छोटी उँगलियाओं को अपने हाथो में लिए मैं एक कॉफ़ी कैफ़े (coffee cafe) में बैठा था cup-2884058__340 जहाँ मैं हमेशा की तरह अपनी हलकी काली हलकी कड़वी कॉफ़ी (coffee) पी रहा था और वो ठंडी मीठी कोल्ड कॉफ़ी (cold coffee) पी रही थी । मैं उस काली कड़वी कॉफ़ी (coffee) को एक मीठे रस की तरह पी रहा था और मेरी आँखें छुप छुप कर उसे कॉफ़ी (coffee) पीते देख रही थी । तभी अचानक मेरी नज़र दूर बैठे एक वेटर (waiter) पर पड़ी जो बड़ी देर से उसे देख रहा था। कहना शायद अच्छा नही लगता पर शायद अपनी आँखें सेक रहा था । वो डरी सहमी सी बैठी थी और मैं गुस्से में अपना आपा सा खो बैठा था । मैंने वेटर को अपने पास बुलाया और उस काली कड़वी कॉफ़ी (coffee) को उसको एक झटके में पिलाया और तभी सुबह खिड़की से सूरज की एक किरण ने मेरी आँखो को खोल जगा दिया । तो आगे क्या हुआ कभी जान ही नही पाया । अब सोमवार का दिन, न कोई त्यौहार था और न कोई बैंक हॉलिडे (holiday) और दफ्तर जल्दी जाना था , तो दोबारा सोकर आगे क्या हुआ जानने का विकल्प भी नहीं था। सपने को वही छोड़ अपनी कॉफ़ी (coffee) पी दफ्तर के लिए निकल गया । हाँ, रास्ते में चिंटू याद आया, मेरा दोस्त जो अक्सर कहता कि कॉफ़ी अच्छी नही होती ।

एम्प्टी मग (Empty Mug)

कल बड़े दिनो के बाद उसे एक दोस्त की शादी में देखा , वो काली चमकीली साड़ी, माथे पर छोटी सी बिंदी, होठो पर हलकी सी लाली और बाल पहले से छोटे थे पर अच्चे लग रहे थे। मैं दूर एक मेज़ पर बैठा कॉफ़ी (coffee) पी रहा था और वो अपने चार दोस्तों के साथ खड़ी हंस रही थी , मुस्कुरा रही थी , और मेरी आँखें फिर से एक बार उसे छुप छुप कर देख रही थी । देखते देखते मुझे वो दिन याद आया जब शाम को कॉफ़ी (coffee) देते हुए उसने मेरे कपड़ो पर गिरा दी थी। मैं गुस्से में उसे डाटने लगा था और वो नाराज़ होकर चली गयी थी। अगले दिन वो अपने परिवार के साथ मुंबई जाने वाली थी। मैं अगली सुबह उसके घर माफ़ी माँगने भी गया था , पर वो जा चुकी थी। सोच रहा था कहीं वो आज भी नाराज़ तो नहीं,  क्या वो मुझसे बात करेगी। अचानक उसने मेरी और देखा और मैं बस एक छोटे  बच्चे की तरह सिर छुपाकर कॉफ़ी (coffee) पीने लगा । मैंने  सोचा क्या उसने देखा मुझे तभी अचानक किसी ने मुझे हाय! (hi !) कहा, मैंने अपना सिर कुछ ऊपर किया तो देखा वो जो सपनो में थी आज मेरे सामने हक़ीक़त बनी खड़ी थी। मैं उसे देख उसकी यादों में खो सा गया था और मेरे कोई जवाब न देने पर उसने फिर से मुझे हाय! (hi !) कहा । मैं कुछ  चौकाँ और खुद को यादो से बाहर निकाल, उसकी ओर देख मैंने भी उसे हाय! (hi !) कहा।

उसने पूछा , “हाउ आर यू ?, राहुल” (how are you ?, Rahul)

मैंने कहा , “आय ऐम फ़ाइन” (I am fine) , तुम कैसी हो ?”

उसने मेरी ओर देख कहा , “मैं अच्छी हूँ”

मैंने भी मुस्कुराते हुए उसे देखते हुए कहा , “हाँ ! तुम आज भी बहुत अच्छी हो”

उसने पूछा मुंबई कब आये ? मुंबई आये मुझे कुछ एक साल हो चूका था पर मैं शायद उसे फिर से नाराज़ नही करना चाहता था इसलिए बस “कुछ  हफ़्तों पहले आया हूँ” कह दिया ।

मैंने उसे अपने पास बैठने के लिए कहा और पूछा , “कॉफ़ी (coffee) पियोगी?”

उसने कहा , “अगर तुम्हारे कपड़ो पर गिरी तो डाँटोंगे तो नही ?”

मैंने बताया की मैं अगले दिन तुम्हे सारी (sorry) कहने आया था ।

उसने हंसकर कहा, “कोई नही तब नहीं कह पाए , तो अब कह दो” ।

उसके बाद हम देर तक बातें करते रहे । रात काफ़ी हो चुकी थी । उसके छोटे काले बालों की तरह हल्के बादल भी छाए थे । उसके सभी दोस्त जा चुके थे , उसने मुझे खुद को घर छोड़ने के लिए बोला और हम अपने जूतों को हाथो में लिए नंगे पाओं समुद्र के किनारे ठंडी रेत पर चलते रहे । हलकी धीमी हवा में बाररश की बूँदें फ़व्वारों की तरह चेहरे पर पड़ रही थी ।  उसकी साड़ी हवा में pair-843320_1280लहर कर बार बार मेरी उँगलियों को छू रही थी । वो रात मेरे लिए एक सपने जैसे थी । चलते चलते कब उसका घर आ गया पता ही नहीं चला। उसने मुझे अंदर आकर कॉफ़ी (coffee) पीने के लिए कहा । रात काफ़ी हो चुकी थी , और सुबह ऑफ़िस (office) जल्दी जाना था इसलिए फिर कभी कहकर , मैं फिर उन तनहा गलियों से उस तनहा से घर की और चल पड़ा , जहाँ मैं रहता था। उस रात मन में अजीब सी ख़ुशी थी, मैं उस सिमटी हुयी चादर पर देर तक आँखें खोले लेटा रहा।  सोच सोच कर मुस्कुराता भी रहा और फिर पता नही कब मेरी आखें बंद हुयी और मैं सो गया।

अब हम अक्सर मिलते थे , कभी ऑफ़िस (office) के पास वाले कैफ़े (cafe) में , कभी जूहू  चौपाटी पर घंटो बातें करते थे। अब मैं उसे वो अपनी कॉलेज (college) वाली पोयम (poem) नही सुनाता था , पर बातों ही बातों में उसे चाहता हूँ ये कई बार कह जाता था। एक दिन देर रात उसका फ़ोन (phone) आया और कहने लगी की सुबह पापा ने कॉफ़ी (coffee) पर बुलाया है। बस ये कहकर फ़ोन (phone) काट दिया और मैं उसके बाद देर तक सोचता रहा। सुबह आँख जल्दी खुल गयी थी और आज मैं घर से कॉफ़ी (coffee) पीकर नही निकला। उसका घर कुछ आधे घंटे की दूरी पर था तो मैं पैदल ही निकल गया । मैंने घर के बाहर लगी एक जिंगल बेल (jingle bell) सी दिखने वाली घंटी को हलके से बजाया । कुछ देर तक कोई नही आया मैं फिर से बजाने वाला ही था कि तभी “कौन है” की आवाज़ आई। मेरे कुछ कहने से पहले दरवाजा खुल गया, दरवाजे पर आंटी (aunty) खड़ी थीं, मैंने  आंटी (aunty) को गुड मॉर्निंग (good morning) कहा। आंटी (aunty) ने अंदर आने को कहा और डाटना शुरू कर दिया , कहने लगी इतने दिन हुए कभी मिलने क्यों नही आये। तभी अंकल (uncle) भी आ गए और उन्होंने मुझे बाल्कनी (balcony) में पड़ी कुर्सी पर बैठने के लिये बाहर बुलाया और आंटी (aunty) को कॉफ़ी (coffee) बनाने के लिए कहा। अंकल (uncle) मेरे साथ बैठकर कई नयी पुरानी बातें करने लगे, मैं अंकल (uncle) की बातों से बोर होने लगा था कि कुछ देर बाद सीढ़ियों से नंगे पाँव भागती हुयी वो भी आ गयी। कुछ देर बाद आंटी (aunty) सबके लिए कॉफ़ी (coffee) लेकर आ गयीं।  कॉफ़ी (coffee) पीते – पीते अंकल (uncle) ने मुझसे उसकी शादी की बात की और कहने लगे एक तुम्हारी नज़र में कोई अच्छा लड़का हो तो बताना , सपना की शादी के लिए।  हाँ , सपना जो पिछले कई सालों से अब तक मेरे लिए भी सपना ही है , जिसे मैं साफ़ सीधे तौर पर कभी बता नहीं पाया । उस सपना को मैं अपने सपनो से निकल हक़ीक़त में पाना चाहता हूँ । पर मुझे अक्सर लगता था कि मैं इतना बुरा तो नहीं हूँ पर शायद अंकल (uncle) को एक अच्छा लड़का चाहिए था। उस दिन मैं वो काली कड़वी कॉफ़ी (coffee) पी नही पा रहा था।

उस रात एक अजीब सा एहसास हो रहा था जैसे खिलखिलाती धुप पर अचानक बदल घिर गए हों, बूँदें भी गिरने लगी थी और मैं खुद को एक बेशाख से पेड़ के नीचे छुपाए बैठा हूँ । मैं रात भर सोच ही रहा था तभी सुबह के लगभग 5 :00 बजे मेरे फ़ोन (phone) की घंटी बजने लगी । मैंने खुद को सोच से जगाया और देखा , सपना का फ़ोन (phone) था।

सपना ने धीमी सी आवाज़ में कहा , “आज शाम को मिल सकते हो, कुछ जरुरी बात करनी है ”

मैंने कहा , “हाँ , जरूर , क्या हुआ तुम ठीक हो ? ”

उसने कहा , “हाँ मैं ठीक हूँ , बाकी  मिलकर बताती हूँ”  और ये कह , सपना ने फ़ोन (phone) काट दिया ।

मैं शाम को अपने ऑफ़िस (office) के पास वाले कैफ़े (cafe) में उसका  इंतज़ार करने लगा और मेरे दिल की धड़कन रेल के beard-2518261_1280एंजिन की तरह बड़ी ज़ोर से धड़क रही थी। मेरे पैर भी काँप रहे थे। शायद मैं कुछ घबराया हुआ था , रह रह कर अजीब अजीब ख्याल आ रहे थे। कुछ देर इंतज़ार करने के बाद सपना भी आ गयी , मैं कॉफ़ी (coffee) ऑर्डर (order) कर चूका था। वो आकर मेरे सामने कुछ देर चुप बैठी रही , और मैं उसकी आँखों को छुप छुप कर देख पढ़ने की कोशिश कर रहा था । वो कुछ कहना चाहती थी , पर मैं पूछ नहीं पा रहा था । और आज उसकी आखें भी चुप थी , तो मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था। इससे पहले मैं अपनी कॉफ़ी (coffee) खत्म करता ,उसने मुझे उठने के लिये कहा , और कहने लगी मेरे साथ मेरे ऑफ़िस (office) चलो। और मुझे संग खींच अपने ऑफ़िस (office) ले गयी । उस दिन न मैं उसकी आखों को पढ़ पा रहा था और न उसके हाथो के हलके से स्पर्श को महसूस कर पा रहा था । आज मैं उसकी चुपी में उलझ सा गया था ।

उसने मुझे ऑछिस के वेटिंग रूम (waiting room) में इंतज़ार करने के लिए कहा । मैं वहाँ बैठा कॉफ़ी (coffee) पीते हुए उसका इंतज़ार करने लगा और मैं इस इंतज़ार की पहेली में फँसता जा रहा था। कुछ देर बाद वो वेटिंग रूम (waiting room) में अपने एक दोस्त के साथ आई। अब शायद पहेली सुलझने वाली थी । ये इंतज़ार खत्म होने वाला था और मेरी कॉफ़ी (coffee) भी । उसने मुझे अपने उस दोस्त से मिलवाया और कहा , राघव , ये अच्छा लड़का है । वो तेज़ धड़कती धड़कने बस रुकने ही वाली थी की तभी कॉफ़ी की उस आखरी sip पीकर, मैंने फिर  एक बार खुद को समझाया।

कुछ महीनो बाद उनकी शादी शादी में मैं भी गया था पर सपना अभी भी एक खूबसूरत सपना है , और एक याद है।

और कॉफ़ी मैं आज भी पीता हूँ ।

– कुमार शांतनु

काव्यशाला द्वारा प्रकाशित रचनाएँ

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