दिल ही तो है – मिर्ज़ा ग़ालिब

दिल ही तो है न संग-ओ-ख़ीश्त दर्द से भर न आये क्यूँ
रोयेंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये क्यूँ

दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं आस्ताँ नहीं
बैठे हैं रहगुज़र पे हम गैर हमें उठाये क्यूँ

क़ैद-ए-हयात-ओ-बन्द-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाये क्यूँ

‘ग़ालिब”-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बन्द हैं
रोइये ज़ार-ज़ार क्या कीजिये हाय-हाय क्यूँ

मिर्ज़ा ग़ालिब

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