मन विचरण करता रहता है –  ज्ञान प्रकाश सिंह

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ऐसे ही विचरण करता मन पहुँच गया क्रीड़ास्थल पर,
ऋषिमा जहाँ खेलने आती , अपनी मम्मी को संग लेकर ।

साधन वहाँ प्रतिस्थापित थे मन बहलाने हेतु अनेक
किन्तु अनूठा दिखलाई , पड़ता था उनमें से एक ।

वह था एक अचेतन लेकिन , होता प्रतीत चेतन युक्त
लहराता दोनों हाथों को मानो करता सबका स्वागत ।

सुघड़ मनोहर उसकी काया , सुदृढ़ अंग परम बलवान
चौखम्बों का ले आधार, धरा पर खड़ा संतरी समान ।

ग्रीष्मकाल में रवि की ज्वाला, उसका तन झुलसाती थी
शीतकाल में हिम की चादर उसकी काया ढक देती थी ।

वर्षा हो या आँधी तूफ़ान , निर्विकार झेला करता था
धूप छांव आती जाती थी, वो सबको सहता रहता था ।

वहाँ लगे खेल उपकरणों में , वह सबसे अलबेला था
ऋषिमा को सबसे प्यारा , वह झूला बड़ा निराला था ।

– ज्ञान प्रकाश सिंह

My Child Hrishima - Front Page

यह कविता लेखक श्री ज्ञान प्रकाश सिंह की पुस्तक ‘माई चाइल्ड ऋषिमा” से ली गयी है । पूरी पुस्तक ख़रीदने हेतु निकटतम पुस्तक भंडार जायें । आप ये पुस्तक ऑनलाइन भी ऑर्डर कर सकते हैं । सम्पर्क करें kavyashaala@gmail.com पर । भारती  प्रकाशन  मूल्य रु 200 /-

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