कविता संग्रह

मचल मत, दूर-दूर, ओ मानी – माखनलाल चतुर्वेदी

मचल मत, दूर-दूर, ओ मानी ! उस सीमा-रेखा पर जिसके ओर न छोर निशानी; मचल मत, दूर-दूर, ओ मानी !

रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पड़ता हैं – राहत इंदौरी 

रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पड़ता हैं चाँद पागल हैं अंधेरे में निकल पड़ता हैं मैं समंदर हूँ कुल्हाड़ी से नहीं कट सकता कोई फव्वारा नही हूँ जो उबल पड़ता हैं

प्रयाणगीत – जयशंकर प्रसाद

हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो, प्रशस्त पुण्य पंथ हैं - बढ़े चलो बढ़े चलो।

यह अमर निशानी किसकी है? – माखनलाल चतुर्वेदी

यह अमर निशानी किसकी है? बाहर से जी, जी से बाहर- तक, आनी-जानी किसकी है? दिल से, आँखों से, गालों तक- यह तरल कहानी किसकी है? यह अमर निशानी किसकी है?

तेरी निगाहों ने – विकाश कुमार

तेरी निगाहों ने मुझे तेरी चौखट पर पकड़ा मैंने तेरे इश्क़ से बस बचकर निकलने ही वाला था तूने आकर फिर से मेरे ज़ख़्म हरे कर दिए मेरा वक़्त मेरे ज़ख़्म बस भरने ही वाला था

ये हादसा तो किसी दिन गुज़रने वाला था – राहत इंदौरी 

ये हादसा तो किसी दिन गुज़रने वाला था मैं बच भी जाता तो इक रोज़ मरने वाला था तेरे सलूक तेरी आगही की उम्र दराज़ मेरे अज़ीज़ मेरा ज़ख़्म भरने वाला था

दो बूँदें – जयशंकर प्रसाद

शरद का सुंदर नीलाकाश निशा निखरी, था निर्मल हास बह रही छाया पथ में स्वच्छ सुधा सरिता लेती उच्छ्वास

आज नयन के बँगले में – माखनलाल चतुर्वेदी

आज नयन के बँगले में संकेत पाहुने आये री सखि! जी से उठे कसक पर बैठे और बेसुधी- के बन घूमें युगल-पलक ले चितवन मीठी, पथ-पद-चिह्न चूम, पथ भूले! दीठ डोरियों पर माधव को

फिर से एक बार मुझे भुला कर देखिए – विकाश कुमार

मोम को आग लगाकर कर देखिए मुझे कभी तो खुद के बराबर देखिए कभी छुप के देखिए मेरे ज़ख्मों को कभी खुद के ज़ख़्म दिखाकर देखिए

मोम के पास कभी आग को लाकर देखूँ – राहत इंदौरी 

मोम के पास कभी आग को लाकर देखूँ सोचता हूँ के तुझे हाथ लगा कर देखूँ कभी चुपके से चला आऊँ तेरी खिलवत में और तुझे तेरी निगाहों से बचा कर देखूँ