कविता संग्रह

नादान – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

कर सकेंगे क्या वे नादान। बिन सयानपन होते जो हैं बनते बड़े सयान। कौआ कान ले गया सुन जो नहिं टटोलते कान। वे क्यों सोचें तोड़ तरैया लाना है आसान।1। है नादान सदा नादान। काक सुनाता कभी नहीं है कोकिल की सी तान। बक सब काल रहेगा बक ही वही रहेगी बान। उसको होगी नहीं हंस लौं नीर छीर पहचान।2।

Advertisements

एक काठ का टुकड़ा – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

जलप्रवाह में एक काठ का टुकड़ा बहता जाता था। उसे देख कर बार बार यह मेरे जी में आता था। पाहन लौं किसलिए उसे भी नहीं डुबाती जल-धारा। एक किसलिए प्रतिद्वन्दी है और दूसरा है प्यारा। मैं विचार में डूबा ही था इतने में यह बात सुनी। जो सुउक्ति कुसुमावलि में से गयी रही रुचि साथ चुनी।

अमर राष्ट्र – माखनलाल चतुर्वेदी

छोड़ चले, ले तेरी कुटिया, यह लुटिया-डोरी ले अपनी, फिर वह पापड़ नहीं बेलने; फिर वह माल पडे न जपनी। यह जागृति तेरी तू ले-ले, मुझको मेरा दे-दे सपना, तेरे शीतल सिंहासन से सुखकर सौ युग ज्वाला तपना।

एक उम्र के बाद रोया नहीं जाता – विकाश कुमार

एक उम्र के बाद रोया नहीं जाता आँख में रहता है अश्क़, ज़ाया नहीं जाता नींद आती थी कभी अब आती नहीं एक उम्र हुयी ख़्वाबों से वो साया नहीं जाता

जवानी – माखनलाल चतुर्वेदी

प्राण अन्तर में लिये, पागल जवानी ! कौन कहता है कि तू विधवा हुई, खो आज पानी?

कृतज्ञता – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

माली की डाली के बिकसे कुसुम बिलोक एक बाला। बोली ऐ मति भोले कुसुमो खल से तुम्हें पड़ा पाला। विकसित होते ही वह नित आ तुम्हें तोड़ ले जाता है। उदर-परायणता वश पामर तनिक दया नहिं लाता है

सोमनाथ – कैफ़ि आज़मी

बुतशिकन कोई कहीं से भी ना आने पाये हमने कुछ बुत अभी सीने में सजा रक्खे हैं अपनी यादों में बसा रक्खे हैं दिल पे यह सोच के पथराव करो दीवानो कि जहाँ हमने सनम अपने छिपा रक्खे हैं वहीं गज़नी के खुदा रक्खे हैं

कहते तो हो तुम सब कि बुत-ए-ग़ालिया – मिर्ज़ा ग़ालिब

कहते तो हो तुम सब कि बुत-ए-ग़ालिया-मू आए  यक मरतबा घबरा के कहो कोई कि वो आए     हूँ कशमकश-ए-नज़ा में हाँ जज़्ब-ए-मोहब्बत  कुछ कह न सकूँ पर वो मिरे पूछने को आए

चपला – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

चपले! क्यों चमक-चमक कर मेघों में छिप जाती हो? क्यों रूप-छटा तुम अपनी दिखला कर भग जाती हो?॥1॥

कायकूं बहार परी – सूरदास

कायकूं बहार परी । मुरलीया ॥ कायकू ब०॥ध्रु०॥ जेलो तेरी ज्यानी पग पछानी । आई बनकी लकरी मुरलिया ॥ कायकु