कविता संग्रह

ऐ ज़िन्दगी गले लगा ले – गुलज़ार

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मुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज़ मिलता है मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है, झपट लेता है, अंटी से कभी खीसे से गिर पड़ता है तो गिरने की आहट भी नहीं होती,

मछुए का गीत – सुमित्रानंदन पंत

प्रेम की बंसी लगी न प्राण!  तू इस जीवन के पट भीतर  कौन छिपी मोहित निज छवि पर?  चंचल री नव यौवन के पर,  प्रखर प्रेम के बाण!  प्रेम की बंसी लगी न प्राण! 

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नई सुब्‍ह – कैफ़ि आज़मी

ये सेहत-बख़्श तड़का ये सहर की जल्वा-सामानी उफ़ुक़ सारा बना जाता है दामान-ए-चमन जैसे छलकती रौशनी तारीकियों पे छाई जाती है उड़ाए नाज़ियत की लाश पर कोई कफ़न जैसे उबलती सुर्ख़ियों की ज़द पे हैं हल्क़े सियाही के पड़ी हो आग में बिखरी ग़ुलामी की रसन जैसे

अभेद का भेद – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

खोजे खोजी को मिला क्या हिन्दू क्या जैन। पत्ता पत्ता क्यों हमें पता बताता है न।1। रँगे रंग में जब रहे सकें रंग क्यों भूल। देख उसी की ही फबन फूल रहे हैं फूल।2। क्या उसकी है सोहती नहीं नयन में सोत। क्या जग में है जग रही नहीं जागती जोत।3।

वे दिन – रमानाथ अवस्थी

याद आते हैं फिर बहुत वे दिन               जो बड़ी मुश्किलों से बीते थे ! शाम अक्सर ही ठहर जाती थी देर तक साथ गुनगुनाती थी ! हम बहुत ख़ुश थे, ख़ुशी के बिन भी चाँदनी रात भर जगाती थी !               हमको मालूम है कि हम कैसे               आग को ओस जैसे पीते थे !

यह धरती कितना देती है – सुमित्रानंदन पंत

मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे,  सोचा था, पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे,  रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी  और फूल फलकर मै मोटा सेठ बनूँगा!  पर बंजर धरती में एक न अंकुर फूटा,  बन्ध्या मिट्टी नें न एक भी पैसा उगला!-  सपने जाने कहाँ मिटे, कब धूल हो गये! 

नया हुस्न – कैफ़ि आज़मी

कितनी रंगीं है फ़ज़ा कितनी हसीं है दुनिया कितना सरशार है ज़ौक़-ए-चमन-आराई आज इस सलीक़े से सजाई गई बज़्म-ए-गीती तू भी दीवार-ए-अजन्ता से उतर आई आज रू-नुमाई की ये साअत ये तही-दस्ती-ए-शौक़ न चुरा सकता हूँ आँखें न मिला सकता हूँ प्यार सौग़ात, वफ़ा नज़्र, मोहब्बत तोहफ़ा यही दौलत तिरे क़दमों पे लुटा सकता हूँ

करूँ क्या ? – रमानाथ अवस्थी

सुर सब बेसुरे हुए करूँ क्या ?              उतरे हुए सभी के मुखड़े              सबके पाँव लक्ष्य से उखड़े उखड़ी हुई भ्रष्ट पीढ़ी से विजय-वरण के लिए कहूँ क्या ?              सागर निकले ताल सरीखे              अन्धों को कब आँसू दीखे

निर्मम संसार – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

वायु के मिस भर भरकर आह । ओस मिस बहा नयन जलधार । इधर रोती रहती है रात । छिन गये मणि मुक्ता का हार ।।१।।

अनुभूति – सुमित्रानंदन पंत

तुम आती हो, नव अंगों का शाश्वत मधु-विभव लुटाती हो। बजते नि:स्वर नूपुर छम-छम, सांसों में थमता स्पंदन-क्रम, तुम आती हो, अंतस्थल में शोभा ज्वाला लिपटाती हो।

दाएरा – कैफ़ि आज़मी

रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ बार-हा तोड़ चुका हूँ जिन को उन्हीं दीवारों से टकराता हूँ रोज़ बसते हैं कई शहर नए रोज़ धरती में समा जाते हैं ज़लज़लों में थी ज़रा सी गर्मी वो भी अब रोज़ ही आ जाते हैं