कविता संग्रह

ऐ ज़िन्दगी गले लगा ले – गुलज़ार

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मुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज़ मिलता है मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है, झपट लेता है, अंटी से कभी खीसे से गिर पड़ता है तो गिरने की आहट भी नहीं होती,

जीवन की ढलने लगी सांझ – अटल बिहारी वाजपेयी

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जीवन की ढलने लगी सांझ उमर घट गई डगर कट गई जीवन की ढलने लगी सांझ।

जवानी – माखनलाल चतुर्वेदी

प्राण अन्तर में लिये, पागल जवानी ! कौन कहता है कि तू विधवा हुई, खो आज पानी?

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कृतज्ञता – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

माली की डाली के बिकसे कुसुम बिलोक एक बाला। बोली ऐ मति भोले कुसुमो खल से तुम्हें पड़ा पाला। विकसित होते ही वह नित आ तुम्हें तोड़ ले जाता है। उदर-परायणता वश पामर तनिक दया नहिं लाता है

सोमनाथ – कैफ़ि आज़मी

बुतशिकन कोई कहीं से भी ना आने पाये हमने कुछ बुत अभी सीने में सजा रक्खे हैं अपनी यादों में बसा रक्खे हैं दिल पे यह सोच के पथराव करो दीवानो कि जहाँ हमने सनम अपने छिपा रक्खे हैं वहीं गज़नी के खुदा रक्खे हैं

कहते तो हो तुम सब कि बुत-ए-ग़ालिया – मिर्ज़ा ग़ालिब

कहते तो हो तुम सब कि बुत-ए-ग़ालिया-मू आए  यक मरतबा घबरा के कहो कोई कि वो आए     हूँ कशमकश-ए-नज़ा में हाँ जज़्ब-ए-मोहब्बत  कुछ कह न सकूँ पर वो मिरे पूछने को आए

चपला – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

चपले! क्यों चमक-चमक कर मेघों में छिप जाती हो? क्यों रूप-छटा तुम अपनी दिखला कर भग जाती हो?॥1॥

कायकूं बहार परी – सूरदास

कायकूं बहार परी । मुरलीया ॥ कायकू ब०॥ध्रु०॥ जेलो तेरी ज्यानी पग पछानी । आई बनकी लकरी मुरलिया ॥ कायकु

सच ये है बेकार हमें ग़म होता है  – जावेद अख़्तर

सच ये है बेकार हमें ग़म होता है  जो चाहा था दुनिया में कम होता है  ढलता सूरज फैला जंगल रस्ता गुम  हमसे पूछो कैसा आलम होता है 

बलि-पन्थी से – माखनलाल चतुर्वेदी

कौन पथ भूले, कि आये ! स्नेह मुझसे दूर रहकर मत व्यर्थ पुकारे शूल-शूल, कह फूल-फूल, सह फूल-फूल। हरि को ही-तल में बन्द किये, केहरि से कह नख हूल-हूल।

बन-कुसुम – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

एक कुसुम कमनीय म्लान हो सूख विखर कर। पड़ा हुआ था धूल भरा अवनीतल ऊपर। उसे देख कर एक सुजन का जी भर आया। वह कातरता सहित वचन यह मुख पर लाया

सुना करो मेरी जाँ – कैफ़ि आज़मी

सुना करो मेरी जाँ इन से उन से अफ़साने  सब अजनबी हैं यहाँ कौन किस को पहचाने यहाँ से जल्द गुज़र जाओ क़ाफ़िले वालों  हैं मेरी प्यास के फूँके हुए ये वीराने  मेरी जुनून-ए-परस्तिश से तंग आ गये लोग  सुना है बंद किये जा रहे हैं बुत-ख़ाने