कविता संग्रह

ऐ ज़िन्दगी गले लगा ले – गुलज़ार

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मुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज़ मिलता है मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है, झपट लेता है, अंटी से कभी खीसे से गिर पड़ता है तो गिरने की आहट भी नहीं होती,

चंचल पग दीप-शिखा- सुमित्रानंदन पंत

चंचल पग दीप-शिखा-से धर गृह,मग, वन में आया वसन्त! सुलगा फाल्गुन का सूनापन सौन्दर्य-शिखाओं में अनन्त! सौरभ की शीतल ज्वाला से फैला उर-उर में मधुर दाह आया वसन्त, भर पृथ्वी पर स्वर्गिक सुन्दरता का प्रवाह!

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संध्‍या के बाद – सुमित्रानंदन पंत

सिमटा पंख साँझ की लाली जा बैठी तरू अब शिखरों पर ताम्रपर्ण पीपल से, शतमुख झरते चंचल स्‍वर्णिम निझर! ज्‍योति स्‍थंभ-सा धँस सरिता में सूर्य क्षितीज पर होता ओझल बृहद जिह्म ओझल केंचुल-सा लगता चितकबरा गंगाजल! धूपछाँह के रंग की रेती अनिल ऊर्मियों से सर्पांकित नील लहरियों में लोरित

सुना है वो हमें भुलाने लगे है  – ख़ुमार बाराबंकवी

सुना है वो हमें भुलाने लगे है तो क्या हम उन्हे याद आने लगे है हटाए थे जो राह से दोस्तो की तो पत्थर मेरे घर में आने लगे है

आइना टाल देता है – विकाश कुमार

रोज़ पूछता हूँ कौन है... रोज़ आइना टाल देता है इस साल कुछ बदलेंगे... दिल क़रार हर साल देता है

वो जो आए हयात याद आई  – ख़ुमार बाराबंकवी

वो जो आए हयात याद आई भूली बिसरी सी बात याद आई कि हाल-ए-दिल उनसे कहके जब लौटे उनसे कहने की बात याद आई

वो हमें जिस कदर आज़माते रहे  – ख़ुमार बाराबंकवी

वो हमें जिस कदर आज़माते रहे अपनी ही मुश्किलो को बढ़ाते रहे  थी कमाने तो हाथो में अब यार के तीर अपनो की जानिब से आते रहे 

कभी शेर-ओ-नगमा बनके  – ख़ुमार बाराबंकवी

कभी शेर-ओ-नगमा बनके कभी आँसूओ में ढलके  वो मुझे मिले तो लेकिन, मिले सूरते बदलके कि वफा की सख़्त राहे कि तुम्हारे पाव नाज़ुक  न लो इंतकाम मुझसे मेरे साथ-साथ चलके

ये मिसरा नहीं है  – ख़ुमार बाराबंकवी

ये मिसरा नहीं है वज़ीफा मेरा है खुदा है मुहब्बत, मुहब्बत खुदा है कहूँ किस तरह में कि वो बेवफा है मुझे उसकी मजबूरियों का पता है हवा को बहुत सरकशी का नशा है  मगर ये न भूले दिया भी दिया है

दुनिया के ज़ोर प्यार के दिन याद आ गये  – ख़ुमार बाराबंकवी

दुनिया के ज़ोर प्यार के दिन याद आ गये  दो बाज़ुओ की हार के दिन याद आ गये गुज़रे वो जिस तरफ से बज़ाए महक उठी  सबको भरी बहार के दिन याद आ गये

बापू के प्रति – सुमित्रानंदन पंत

तुम मांस-हीन, तुम रक्तहीन, हे अस्थि-शेष! तुम अस्थिहीन, तुम शुद्ध-बुद्ध आत्मा केवल, हे चिर पुराण, हे चिर नवीन! तुम पूर्ण इकाई जीवन की, जिसमें असार भव-शून्य लीन; आधार अमर, होगी जिस पर