कविता संग्रह

ऐ ज़िन्दगी गले लगा ले – गुलज़ार

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मुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज़ मिलता है मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है, झपट लेता है, अंटी से कभी खीसे से गिर पड़ता है तो गिरने की आहट भी नहीं होती,

जीवन की ढलने लगी सांझ – अटल बिहारी वाजपेयी

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जीवन की ढलने लगी सांझ उमर घट गई डगर कट गई जीवन की ढलने लगी सांझ।

अज़ मेहर ता-ब-ज़र्रा दिल-ओ-दिल है आइना – मिर्ज़ा ग़ालिब

अज़ मेहर ता-ब-ज़र्रा दिल-ओ-दिल है आइना  तूती को शश जिहत से मुक़ाबिल है आइना

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चल मेरी ढोलकी – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

चल मेरी ढोलकी ढमाक-ढम, नानी के घर जाते हम। चल मेरी ढोलकी ढमाक-ढम नहीं रुकेंगे कहीं भी हम!

जमुनाके तीर बन्सरी बजावे कानो – सूरदास

जमुनाके तीर बन्सरी बजावे कानो ॥ज०॥ध्रु०॥ बन्सीके नाद थंभ्यो जमुनाको नीर खग मृग।  धेनु मोहि कोकिला अनें किर ॥बं०॥१॥ सुरनर मुनि मोह्या रागसो गंभीर । 

बहाना ढूँढते रहते हैं  – जावेद अख़्तर

बहाना ढूँढते रहते हैं कोई रोने का हमें ये शौक़ है क्या आस्तीं भिगोने का अगर पलक पे है मोती तो ये नहीं काफ़ी हुनर भी चाहिए अल्फ़ाज़ में पिरोने का

दीप से दीप जले – माखनलाल चतुर्वेदी

सुलग-सुलग री जोत दीप से दीप मिलें कर-कंकण बज उठे, भूमि पर प्राण फलें। लक्ष्मी खेतों फली अटल वीराने में लक्ष्मी बँट-बँट बढ़ती आने-जाने में लक्ष्मी का आगमन अँधेरी रातों में लक्ष्मी श्रम के साथ घात-प्रतिघातों में लक्ष्मी सर्जन हुआ कमल के फूलों में लक्ष्मी-पूजन सजे नवीन दुकूलों में।।

समझ का फेर – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

है भरी कूट कूट कोर कसर। माँ बहन से करें न क्यों कुट्टी। लोग सहयोग कर सकें कैसे। है असहयोग से नहीं छुट्टी।1।

बस इक झिझक है यही – कैफ़ि आज़मी

बस इक झिझक है यही हाल-ए-दिल सुनाने में  कि तेरा ज़िक्र भी आयेगा इस फ़साने में  बरस पड़ी थी जो रुख़ से नक़ाब उठाने में  वो चाँदनी है अभी तक मेरे ग़रीब-ख़ाने में 

लड्डू ले लो – माखनलाल चतुर्वेदी

ले लो दो आने के चार लड्डू राज गिरे के यार यह हैं धरती जैसे गोल ढुलक पड़ेंगे गोल मटोल इनके मीठे स्वादों में ही बन आता है इनका मोल दामों का मत करो विचार

एक तुम हो – माखनलाल चतुर्वेदी

गगन पर दो सितारे: एक तुम हो, धरा पर दो चरण हैं: एक तुम हो, ‘त्रिवेणी’ दो नदी हैं! एक तुम हो,  हिमालय दो शिखर है: एक तुम हो,  रहे साक्षी लहरता सिंधु मेरा, कि भारत हो धरा का बिंदु मेरा ।

पशेमानी – कैफ़ि आज़मी

मैं ये सोच कर उस के दर से उठा था कि वो रोक लेगी मना लेगी मुझको कदम ऐसे अंदाज से उठ रहे थे कि वो आवाज़ देकर बुला लेगी मुझको हवाओं मे लहराता आता था दामन कि दामन पकड़ के बिठा लेगी मुझको